नई दिल्ली- ओशो धाम में श्रद्धा और आत्मचिंतन के साथ ‘डिसाइपल डे’ मनाया गया, जो ओशो की प्रथम शिष्या और प्रथम सचिव मा योग लक्ष्मी की जयंती के उपलक्ष्य में समर्पित है। यह दिन किसी व्यक्तित्व या पद को नहीं, बल्कि शिष्यत्व के सार को समर्पित है। साधक और ध्यान कर्ता एकत्र हुए और उनके जीवन को समर्पण, विश्वास और गुरु के साथ पूर्ण सामंजस्य के जीवंत उदाहरण के रूप में नमन किया। प्रातःकाल “द ओनली लाइफ” (लेखक: राशिद मैक्सवेल) पुस्तक का वाचन और साझा सत्र आयोजित किया गया, जिसमें मा लक्ष्मी की अहं-उत्क्रमण और ओशो के दृष्टिकोण के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की यात्रा पर प्रकाश डाला गया। विभिन्न सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने इस बात पर मनन किया कि एक सच्चा शिष्य होना वास्तव में क्या है। मा योग लक्ष्मी का जीवन संदेह-रहित भक्ति, अहंकार-रहित कर्म और सजगता में क्रिया का प्रतीक माना गया। ओशो ने उन्हें “परफेक्ट व्हीकल” कहा था, यह स्वीकार करते हुए कि वे उनके कार्य के लिए एक पारदर्शी माध्यम की तरह कार्य करती थीं। उनकी सादगी, अथक ऊर्जा और अटूट श्रद्धा आज भी आंतरिक रूपांतरण के पथ पर अग्रसर साधकों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। इस अवसर पर ओशो की दीर्घकालिक शिष्या मा धर्म ज्योति ने कहा, डिसाइपल डे केवल मा लक्ष्मी को स्मरण करने का अवसर नहीं है; यह अपने भीतर के शिष्य को पुन खोजने का दिन है। उन्होंने हमें दिखाया कि शिष्यत्व अंध आज्ञापालन नहीं, बल्कि गहरी सामंजस्यता है गुरु और अस्तित्व के प्रति एक साहसी आंतरिक ‘हाँ’। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि जब समर्पण सजगता में निहित होता है, तो वह अपार शक्ति और अनुग्रह का द्वार बन जाता है। कार्यक्रम का समापन युवा ओशो संन्यासिन मा प्रेम अर्पिता (हीरल सिंघल) की कला प्रदर्शनी “डिवाइन इंटरवेंशन” के उद्घाटन के साथ हुआ। उनकी ध्यानमग्न और सहज अंतःप्रेरित चित्रकृतियाँ, जो मासूमियत और आंतरिक विश्वास को अभिव्यक्त करती हैं, का उद्घाटन माँ धर्म ज्योति द्वारा किया गया। इस प्रदर्शनी ने दिन के आयोजनों में एक सृजनात्मक आयाम जोड़ा और समर्पण तथा उपस्थिति की भावना को और सुदृढ़ किया। ध्यान, स्मरण और कला के माध्यम से ओशो धाम में मनाया गया ‘डिसाइपल डे’ गुरु और शिष्य के बीच के शाश्वत संबंध तथा पूर्ण आंतरिक ‘हाँ’ की रूपांतरणकारी शक्ति का उत्सव बन गया।
