नई दिल्ली – भारतीय मानसिक स्वास्थ्य, एडवोकेसी और एक्शन सोसाइटी का राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन सामूहिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक जड़ों और प्रणालीगत सुधार के सशक्त आह्वान के साथ आरंभ हुआ। वक्ताओं ने इसे एक एकल आयोजन नहीं, बल्कि एक सतत राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत बताया। स्वागत संबोधन: नैतिक दिशा की स्थापना सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन डॉ. महेंद्र काबरा द्वारा दिए गए गहन एवं चिंतनशील स्वागत संबोधन से हुआ। आरआर केबल और हेम फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी तथा ISMHAA के मुख्य संरक्षक डॉ. काबरा ने रेखांकित किया कि भारत अपनी मानसिक स्वास्थ्य यात्रा के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को साझा सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए और यह शिखर सम्मेलन कार्रवाई, नैतिकता तथा दीर्घकालिक क्षमता निर्माण के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक क्षेत्रों में कार्यरत मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के समर्पण की सराहना करते हुए नीति, व्यवहार और समुदाय के बीच निरंतर सहयोग का आह्वान किया।दीप प्रज्वलन और गणेश वंदना के साथ समारोह का शुभारंभ हुआ, जो बुद्धि, नए आरंभ और आगे के कार्यों के लिए आवश्यक नैतिक आधार का प्रतीक था। इसके पश्चात द प्रील्यूड स्कूल, आगरा के छात्रों (द प्रील्यूडियंस) की प्रस्तुति ने वर्तमान किशोर पीढ़ी की समझ और उनके समक्ष मौजूद चुनौतियों की सजीव झलक प्रस्तुत की।मुख्य भाषण: बदलती दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य की पुनर्कल्पना अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के सीईओ डॉ. आर्थर सी. इवांस द्वारा दिया गया मुख्य भाषण, “Hope is Healing (आशा ही उपचार है)” विषय के अंतर्गत, सम्मेलन की बौद्धिक और भावनात्मक दिशा तय करता है। डॉ. इवांस ने प्रतिक्रियात्मक और रोग-केंद्रित मॉडलों से आगे बढ़कर समग्र, निवारक और समुदाय-एकीकृत देखभाल प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने परिवारों, प्राकृतिक सहयोग प्रणालियों और विभिन्न क्षेत्रों के बीच साझेदारी की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल चिकित्सीय परिसरों तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनका संबोधन बीमारी की अनुपस्थिति से आगे बढ़कर कल्याण की उपस्थिति की ओर बढ़ने के प्रेरक आह्वान के साथ समाप्त हुआ।दूसरा मुख्य भाषण डॉ. ऐन वर्नन द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने सामाजिक–भावनात्मक अधिगम (SEL) को शिक्षा नीति का एक मूल स्तंभ बताया। अंतरराष्ट्रीय साक्ष्यों के आधार पर उन्होंने दर्शाया कि SEL अकादमिक परिणामों, भावनात्मक संतुलन, संबंधों और दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है, तथा इसे प्रारंभिक शिक्षा से किशोरावस्था तक एक निवारक पाठ्यक्रम के रूप में लागू करने की वकालत की। तीसरे मुख्य भाषण में डॉ. रेनर कुर्ज़ ने ग्रेट 8 सक्सेस फैक्टर्स ढांचे को प्रस्तुत किया, जिसमें तर्कशीलता को मानव कार्यप्रणाली के केंद्र में रखा गया। उन्होंने जाँच, सृजन, सामना करने और सहयोग जैसे आठ मूल कौशलों को लचीलापन, अनुकूलन क्षमता और दीर्घकालिक मानसिक कल्याण के लिए अनिवार्य बताया।चौथे मुख्य भाषण में डॉ. अमूल रंजन सिंह ने विशेष रूप से विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन और निवारण की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने बच्चों की भावनात्मक दृढ़ता के निर्माण में माता-पिता और शिक्षकों की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया, तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता के प्रति सावधान किया और खेल, क्रीड़ा, संस्कृति तथा मानवीय संबंधों की ओर लौटने को मानसिक स्वास्थ्य के सुरक्षात्मक कारक के रूप में प्रस्तुत किया।अध्यक्षीय संबोधन: जागरूकता से जवाबदेही की ओर ISMHAA की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. चिनु अग्रवाल ने अपने निर्णायक अध्यक्षीय संबोधन में भारत के मानसिक स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र के समक्ष मौजूद नैतिक और नियामक चुनौतियों को स्पष्ट किया। उन्होंने जागरूकता से आगे बढ़कर जवाबदेही की आवश्यकता पर बल देते हुए सशक्त शासन, नैतिक व्यवहार और जन-सुरक्षा की तात्कालिक जरूरत बताई। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्लेटफार्मों के बढ़ते प्रभाव पर बोलते हुए उन्होंने चेताया कि तकनीक को मानवीय विवेक द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि देखभाल की दिशा निर्धारित करने देना चाहिए। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में छद्म-विज्ञान और भ्रामक प्रस्तुतियों के प्रति भी आगाह किया। मुख्य अतिथि का संबोधन: एक सभ्यतागत दृष्टिकोण मुख्य अतिथि श्री मनोज जोशी ने ISMHAA को भारत की सभ्यतागत बुद्धि में निहित एक आंदोलन बताया। उन्होंने स्मरण कराया कि आधुनिक मनोविज्ञान से बहुत पहले भारतीय परंपराओं में मानसिक स्वास्थ्य का ज्ञान विद्यमान था और चेतावनी दी कि समकालीन समाज आत्मकेंद्रित और विखंडित होने का जोखिम उठा रहा है। उनका संबोधन सम्मेलन के केंद्रीय संदेश को सुदृढ़ करता है, मानसिक स्वास्थ्य लोगों के लिए, लोगों के बारे में होना चाहिए। पैनल चर्चाएँ, जीवन अनुभव और सामूहिक संवाद सम्मेलन में कई समृद्ध पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं, जिनमें “मनोविज्ञान का अभ्यास: वन-टू-वन से वन-टू-मैनी” शामिल था, जिसमें सामुदायिक सहभागिता और निवारक शिक्षा के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रभाव को बढ़ाने पर चर्चा हुई। “जेन ज़ी मानसिक स्वास्थ्य: अंतराल, दबाव और मार्ग” पैनल में युवा पीढ़ी के सामने मौजूद प्रणालीगत तनावों और उनके समाधान पर विचार किया गया। डॉ. चिनु अग्रवाल द्वारा संचालित “हार्ट टॉक्स” सत्र विशेष रूप से भावुक और प्रभावशाली रहा, जिसमें जीवन अनुभवों को सीख के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया और उपलब्धियों से परे करुणा, सराहना और आत्म-मूल्य की संस्कृति का आह्वान किया गया। शोध, क्षमता निर्माण और नीति कार्रवाई सम्मेलन में मौखिक शोध प्रस्तुतियों, गोलमेज सम्मेलनों और किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित सतत पुनर्वास शिक्षा (CRE) कार्यशाला के कई सत्र आयोजित किए गए। समापन समारोह का एक प्रमुख आकर्षण भारत सरकार की संसदीय संस्था को प्रस्तुत किए जाने वाले एक श्वेत पत्र का अनावरण था, जिसने संवाद को ठोस नीति कार्रवाई में बदलने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का समापन मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कार वितरण और आशा, सहयोग तथा निरंतर कार्रवाई की पुनः पुष्टि करने वाले समापन संबोधन के साथ हुआ। सामूहिक संकल्प सम्मेलन के समापन के साथ एक संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया: भारत का मानसिक स्वास्थ्य भविष्य अलग-थलग पहलों पर नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व, सांस्कृतिक जड़ों, अंतःविषय सहयोग और सतत जवाबदेही पर निर्भर करता है। ISMHAA के राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन ने इस यात्रा की मजबूत नींव रख दी है, आशा, उत्तरदायित्व और सामूहिक संकल्प से प्रेरित।
