नई दिल्ली – एनेबल इंडिया की संस्थापक एवं मैनेजिंग ट्रस्टी शांति राघवन ने कहा कि सुगम और समावेशी शहरों का निर्माण कोई दया नहीं, बल्कि भविष्य की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि आज शहरी ढांचा केवल पूरी तरह सक्षम लोगों को ध्यान में रखकर बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में वही शहर बुजुर्गों, दिव्यांगों और आम नागरिकों के लिए बाधा बन जाएंगे।उन्होंने बताया कि भारत के कुछ शहरों में ‘एकांश’ और ‘गुदगुदी’ जैसी संस्थाओं द्वारा विकसित समावेशी खेल मैदान इस बात का प्रमाण हैं कि सही सोच के साथ बदलाव संभव है। ऐसे मैदानों में व्हीलचेयर पर बैठे बच्चे भी अन्य बच्चों की तरह खेल का आनंद ले पा रहे हैं।एनेबल इंडिया के संस्थापक और मैनेजिंग ट्रस्टी शांति राघवन के अनुसार, शहरों की ऊबड़-खाबड़ सड़कें, दुर्गम रैंप और असुविधाजनक परिवहन व्यवस्था केवल दिव्यांगों ही नहीं, बल्कि बढ़ती उम्र, चोट या अस्थायी शारीरिक समस्या से जूझ रहे हर व्यक्ति को प्रभावित करती है। ढलान वाले रैंप, ऑडियो सिग्नल और बाधा-मुक्त परिवहन सभी नागरिकों के लिए उपयोगी हैं।उन्होंने कहा कि टोक्यो, लंदन और भारत में दिल्ली मेट्रो जैसे उदाहरण यह साबित करते हैं कि समावेशी ढांचा बड़े स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। इसके बावजूद, ‘स्मार्ट सिटी’ की होड़ में कई शहरों में आज भी ये बुनियादी सुविधाएं नजरअंदाज की जा रही हैं। शांति राघवन ने जोर देते हुए कहा कि अब आवश्यकता है नीतिगत और व्यवस्थागत बदलाव की, जिसमें सुगम्यता को अनिवार्य बनाया जाए। आज का युवा ही कल का बुजुर्ग है, इसलिए समय रहते ऐसे शहरों का निर्माण आवश्यक है जो हर आयु और हर क्षमता के लोगों के लिए समान रूप से सुरक्षित और सम्मानजनक हों। शांति राघवन कहतीं हैं कि जो शहर अपने सभी नागरिकों को सम्मानजनक स्थान नहीं देते, वे असफल शहर हैं। ऐसे शहर न केवल नागरिकों की गरिमा पर चोट करते हैं, बल्कि वे आर्थिक अवसरों और नई प्रतिभाओं के खिलने की संभावनाओं को भी सीमित कर देते हैं। आज का युवा जब तक कल का वरिष्ठ नागरिक बनेगा, तब तक शहरों के बुनियादी ढांचे में सुधार करना बहुत देर और बहुत खर्चीला काम हो चुका होगा। इसलिए, समय की मांग है कि हम आज ही ऐसे शहरों का निर्माण करें जो हर आयु, हर शारीरिक क्षमता और हर मनुष्य के लिए स्वागतपूर्ण हों।
