नई दिल्ली – प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित दो दिवसीय साहित्यिक और सांस्कृतिक महोत्सव रामायण एपिक ऑफ ऑल एपिक्स आज संपन्न हो गया । डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के इंदिरा मिरी कॉन्फ्रेंस हॉल आयोजित इस कार्यक्रम में कई रोचक और विचारोत्तेजक सत्र आयोजित किए गए। दो दिवसीय इस महोत्सव का आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन ने ऑयल इंडिया लिमिटेड के सहयोग से किया था जिसका उद्देश्य कालजयी महाकाव्य रामायण की साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक समृद्धि का उत्सव मनाना है। दूसरे दिन के सत्रों की शुरुआत क्षेत्रीय, लोक और जनजातीय रामायण विषय पर आयोजित चर्चा से हुई। इस सत्र की अध्यक्षता कराबी डेका हजारिका ने की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में प्रचलित रामायण परंपराओं की उल्लेखनीय विविधता पर प्रकाश डाला। इस चर्चा में भवानी घिमिरे और धुरजति शर्मा बतौर वक्ता शामिल हुए। उन्होंने बताया कि लोक कथाओं और जनजातीय परंपराओं ने मौखिक कथन और क्षेत्रीय साहित्यिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से रामायण को समृद्ध किया है तथा उसकी नई-नई व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। श्री घिमिरे ने विभिन्न जनजातीय कथाओं में रामायण के विविध पहलुओं, जैसे मृत्यु संबंधी मान्यताओं और नामों आदि पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. शर्मा ने कृतिवास, वाल्मीकि और माधव कंदली की रामायण परंपराओं में निहित विविधताओं को प्रस्तुत किया। सत्र की अध्यक्ष कराबी डेका हजारिका ने उत्तर-पूर्व भारत में प्रचलित रामायण के विभिन्न रूपों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी। दूसरा सत्र रामायण का सांस्कृतिक और सभ्यतागत प्रभाव विषय पर आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रमोद जैन ने की। इस सत्र में वक्ता अनुजा चंद्रमौली ने भारतीय सांस्कृतिक ,सामाजिक मूल्यों, कला रूपों और साहित्यिक परंपराओं पर रामायण के गहरे प्रभाव के बारे में विस्तार से चर्चा की और इसकी शाश्वत प्रासंगिकता को रेखांकित किया। श्री जैन ने अपने वक्तव्य में बताया कि भगवान राम के चरित्र ने भारतीय सभ्यता को किस प्रकार प्रभावित किया, जबकि सुश्री अनुजा चंद्रमौली ने सीता की अग्निपरीक्षा के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत किए और राम को एक आदर्श प्रशासक के रूप में भी रेखांकित किया। इसके बाद आयोजित सत्र रामायण में भक्ति और आध्यात्मिकता की अध्यक्षता युगल जोशी ने की। इस चर्चा में एम. ए. अलवार और अनुजा चंद्रमौली बतौर वक्ता शामिल हुए। वक्ताओं ने रामायण की आध्यात्मिक गहराई पर विचार व्यक्त किए और बताया कि यह महाकाव्य आज भी लोगों को भक्ति, नैतिक जीवन और दार्शनिक चिंतन के लिए प्रेरित करता है। प्रो. अलवार ने संस्कृत श्लोकों के पाठ से अपनी बात की शुरुआत की और रामायण में सीता के महत्व को स्पष्ट किया। वहीं युगल जोशी और अनुजा चंद्रमौली ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए। दोपहर का सत्र उत्तर-पूर्व भारत में रामायण: पाठ, प्रदर्शन और पहचान विषय पर आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता प्रो. सत्यकाम बोरठाकुर ने की, जबकि इस सत्र में प्रो. एम. प्रियव्रत सिंह वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने बताया कि किस प्रकार मणिपुरी रामायण ने उत्तर-पूर्व भारत की साहित्यिक परंपराओं, प्रदर्शन कलाओं और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित किया है। प्रो. बोरठाकुर ने असमिया रामायण और कामरूपी सभ्यता पर एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया। दिन का अंतिम अकादमिक सत्र रामायण की दार्शनिक और नैतिक शिक्षाएँ विषय पर आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता एम. ए. अलवार ने की। इस सत्र में जीतू बोरा और दर्पणजीत कोंवर ने चर्चा प्रस्तुत की। उन्होंने रामायण के नैतिक और दार्शनिक संदेशों का विश्लेषण करते हुए बताया कि यह महाकाव्य आज भी सामाजिक मूल्यों और नैतिक चिंतन को दिशा प्रदान करता है। दिन का समापन एक सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसने पूरे महोत्सव को एक जीवंत और उत्साहपूर्ण समापन दिया तथा रामायण से प्रेरित कलात्मक परंपराओं का उत्सव मनाया। विचारपूर्ण चर्चाओं और विविध दृष्टिकोणों के माध्यम से महोत्सव के दूसरे दिन ने विद्वानों, लेखकों, विद्यार्थियों और सांस्कृतिक रसिकों के लिए एक समृद्ध बौद्धिक मंच प्रदान किया, जहाँ वे भारत के सबसे पूजनीय महाकाव्यों में से एक रामायण पर गहराई से विमर्श कर सके। इस महोत्सव ने एक बार फिर यह स्थापित किया कि रामायण आज भी भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में साहित्य, दर्शन, संस्कृति और प्रदर्शन कलाओं को निरंतर प्रेरित करती रही है।
