नई दिल्ली – भारत की सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक मूल्यों और सतत विकास के भारतीय दृष्टिकोण को एक साथ प्रस्तुत करने वाली डॉ. नरेश त्यागी की पुस्तक ‘सस्टेनेबल प्रॉमिसेज़’ के हिंदी संस्करण का लोकार्पण इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विचारक, नीति विशेषज्ञ, शिक्षाविद् और सामाजिक प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री राम बहादुर राय, मेजर जनरल (डॉ.) जी.डी. बक्षी, सांसद श्री के.सी. त्यागी, उद्योगपति श्री राकेश जैन, प्रधानमंत्री कार्यालय में आर्थिक सलाहकार श्री अपुर्व मिश्रा तथा H.E. ताशी पेलडॉन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि पुस्तक का हिंदी में प्रकाशन सतत विकास और सामंजस्यपूर्ण प्रगति से जुड़े विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में सततता को समझने के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है।लेखक डॉ. नरेश त्यागी ने कहा कि यह पुस्तक इस मूल विश्वास पर आधारित है कि सतत विकास कोई पश्चिम से आयातित अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन दर्शन का अभिन्न अंग रहा है। हिंदी संस्करण के माध्यम से उनका उद्देश्य प्रकृति, विकास और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की अवधारणा को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना है।वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत का स्वदेशी दृष्टिकोण कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में आर्थिक सलाहकार अपुर्व मिश्रा ने कहा कि ऐसे समय में, जब वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास कमजोर पड़ते दिख रहे हैं, यह पुस्तक भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। उन्होंने कहा कि भारत में प्रकृति और मानव को अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक माना गया है और यही सोच आज वैश्विक नेतृत्व का आधार बन सकती है।डॉ. त्यागी ने पुस्तक में भारतीय परंपराओं, वैदिक चिंतन और आधुनिक वैश्विक चुनौतियों के बीच संतुलन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कृति प्रकृति के साथ सामंजस्य, नैतिक नेतृत्व और दीर्घकालिक विकास की आवश्यकता को सरल और प्रभावी भाषा में सामने रखती है।लोकार्पण समारोह के दौरान सततता, सामाजिक उत्तरदायित्व और भविष्य की विकास रणनीतियों पर सार्थक विचार-विमर्श हुआ, जिससे यह आयोजन केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम न रहकर गंभीर वैचारिक संवाद का मंच बन गया।‘सस्टेनेबल प्रॉमिसेज़’ का हिंदी संस्करण भारत के सतत भविष्य, सांस्कृतिक चेतना और विकास के स्वदेशी मॉडल को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए एक प्रेरणादायक और महत्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जा रहा है।
