नई दिल्ली – भारत में किडनी से जुड़ी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं और यह अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रही हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, लंबे समय तक दवाओं का सेवन, खराब खान-पान और नियमित जांच की कमी इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। शुरुआती चरण में सूजन, थकान या पेशाब में बदलाव जैसे लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, लेकिन समय के साथ स्थिति गंभीर हो जाती है। तब परिवार बेहतर किडनी विशेषज्ञ अस्पताल की तलाश शुरू करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किडनी का उपचार केवल रिपोर्ट या मशीनों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। किडनी का संबंध पाचन, रक्त संचार और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने की प्रक्रिया से भी होता है। यदि ये प्रणालियाँ कमजोर हों, तो सिर्फ दवाइयाँ पर्याप्त नहीं होतीं। ऐसे में उपचार के लिए समय, सही योजना और मरीज के सहयोग की आवश्यकता होती है। आयुर्वेद की नजर में किडनी रोग आयुर्वेद किडनी की बीमारी को अचानक होने वाली समस्या नहीं मानता। इसे शरीर में लंबे समय से बने असंतुलन का परिणाम समझा जाता है। पाचन धीमा पड़ता है, अपशिष्ट शरीर में जमा होते हैं, रक्त प्रवाह घटता है और धीरे-धीरे किडनी की क्षमता कम होने लगती है। इसलिए उपचार चरणबद्ध तरीके से किया जाता है। सबसे पहले भोजन की आदतों को सुधारा जाता है, फिर रक्त संचार और विषहरण प्रक्रिया को सहारा दिया जाता है। उद्देश्य तुरंत राहत नहीं बल्कि स्थिर और निरंतर सुधार होता है। GRAD सिस्टम क्या है Jeena Sikho HiiMS में किडनी देखभाल आयुर्वेद पर आधारित एक व्यवस्थित पद्धति से की जाती है, जिसे GRAD सिस्टम कहा जाता है। यह उन मरीजों के लिए अपनाया जाता है जो विशेषज्ञ निगरानी में प्राकृतिक और डायलिसिस-मुक्त सहायता चाहते हैं, जहाँ यह संभव हो। इस प्रणाली में कई तरीके शामिल हैं हॉट वॉटर इमर्शन: गुनगुने पानी में बैठने से रक्त संचार धीरे-धीरे बेहतर होता है। कई लोगों को आराम महसूस होता है और त्वचा के माध्यम से अपशिष्ट बाहर निकलने में मदद मिलती है। हेड-डाउन टिल्ट पद्धति: इसमें कुछ समय के लिए सिर को पैरों से नीचे रखा जाता है, जिससे किडनी तक रक्त प्रवाह बढ़ता है। बेहतर रक्त संचार फिल्ट्रेशन और पेशाब की मात्रा को सहारा दे सकता है। DIP डाइट: इस आहार पद्धति में फल, सब्जियाँ और मिलेट आधारित भोजन शामिल होते हैं। भोजन निश्चित क्रम और समय पर लिया जाता है। भारी भोजन, देर रात का खाना और पैकेज्ड चीजें टाली जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इससे किडनी पर दबाव कम करने और प्राकृतिक सुधार में सहायता मिलती है। जड़ी-बूटियों की भूमिका आयुर्वेदिक किडनी देखभाल में Punarnava, Varun, Gokshura और Kasni जैसी जड़ी-बूटियों का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है। ये सूजन कम करने, मूत्र प्रवाह को सहारा देने और शरीर से विषैले तत्व निकालने में मदद करती हैं। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि किसी भी प्रकार की हर्बल दवा केवल किडनी विशेषज्ञ की सलाह से ही लेनी चाहिए। स्वयं दवा लेना हानिकारक हो सकता है। भोजन और जीवनशैली पर जोर मरीजों को ताजा और मौसमी भोजन लेने की सलाह दी जाती है। सामान्यतः पौधों पर आधारित आहार को प्राथमिकता दी जाती है। सूर्यास्त से पहले हल्का रात्रि भोजन, जंक फूड, मैदा और अधिक नमक से परहेज की सलाह दी जाती है। सही मात्रा में पानी पीना, धीरे-धीरे खाना और अच्छे से चबाना भी उपचार का हिस्सा माना जाता है। ये आदतें पाचन सुधारती हैं और किडनी पर अतिरिक्त बोझ कम करती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आज लोग ऐसे केंद्रों की ओर देख रहे हैं जहाँ केवल आपातकालीन इलाज नहीं, बल्कि लंबी अवधि की देखभाल पर ध्यान दिया जाता है। सही समय पर किडनी डॉक्टर से मार्गदर्शन लेने से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। बढ़ते मामलों के बीच, Jeena Sikho HiiMS में विशेषज्ञों की निगरानी में दी जा रही संरचित आयुर्वेदिक देखभाल प्राकृतिक उपचार विकल्प के रूप में लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
