भारत आज ऐसी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रहा है जहां युवा केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले बन रहे हैं। स्टार्टअप संस्कृति ने इस सोच को तेजी से बदला है। तकनीक, विनिर्माण, फिनटेक, स्वास्थ्य, शिक्षा, लॉजिस्टिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में नए उद्यम सामने आ रहे हैं। इनका सीधा संबंध निवेश, नवाचार, रोजगार और आर्थिक मूल्य निर्माण से है।इसी दौर में देश में गैर सरकारी संगठनों यानी एनजीओ की बड़ी मौजूदगी पर भी गंभीर बहस जरूरी है। सरकारी एनजीओ दर्पण पोर्टल पर पंजीकृत संगठनों की संख्या छह लाख से अधिक है। वहीं भारत में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। दोनों क्षेत्रों की तुलना सीधे सीधे करना उचित नहीं होगा, लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि देश की संस्थागत ऊर्जा का कितना हिस्सा उत्पादन, रोजगार और उद्यमिता में जा रहा है और कितना हिस्सा ऐसे अभियानों में खर्च हो रहा है जिनका आर्थिक परिणाम स्पष्ट नहीं दिखाई देता।स्टार्टअप शुरू करना आसान नहीं होता। इसमें पूंजी लगती है, बाजार का जोखिम उठाना पड़ता है, ग्राहकों को उत्पाद या सेवा देनी होती है और लगातार परिणाम साबित करने पड़ते हैं। सफल होने पर रोजगार पैदा होते हैं, टैक्स मिलता है, निवेश आता है और पूरी अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। एनजीओ का उद्देश्य अलग है और कई संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण, आपदा राहत और सामाजिक कल्याण में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां सामाजिक उद्देश्य के नाम पर संगठन की वास्तविक गतिविधियों, वित्तीय स्रोतों और परिणामों की पर्याप्त जांच नहीं हो पाती। किसी स्टार्टअप से पूछा जाता है कि उसने कितना कारोबार किया, कितने ग्राहक जोड़े और कितने रोजगार बनाए। इसी तरह एनजीओ से भी यह पूछा जाना चाहिए कि उसे मिला पैसा कहां खर्च हुआ, कितने लोगों तक उसका लाभ पहुंचा और उसके काम का वास्तविक सामाजिक परिणाम क्या रहा।भारत में एनजीओ की वास्तविक संख्या को लेकर अलग अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। कई बार लाखों संगठनों के आंकड़े बताए जाते हैं, लेकिन इन आंकड़ों की स्वतंत्र और अद्यतन पुष्टि जरूरी है। यही स्थिति वित्तीय स्रोतों को लेकर भी है। विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए भारत में FCRA के तहत नियम मौजूद हैं। विदेशी फंडिंग अपने आप में गलत नहीं है। अनेक संगठन इसी माध्यम से सामाजिक और मानवीय कार्य करते हैं। लेकिन जहां विदेशी धन आता है, वहां पारदर्शिता और नियामकीय अनुपालन और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। विशेषकर ऐसे मामलों में जहां किसी संगठन की गतिविधियां बड़े औद्योगिक, बुनियादी ढांचा या नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश करती दिखाई दें, वहां सवाल पूछना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी संगठन की आलोचना केवल उसके विदेशी फंड प्राप्त करने के आधार पर नहीं की जा सकती। प्रमाण, वित्तीय रिकॉर्ड और वास्तविक गतिविधियां ही कार्रवाई का आधार होनी चाहिए।भारत जैसे लोकतंत्र में किसी परियोजना का विरोध करना नागरिक अधिकार है। बांध, खनन, बंदरगाह, राजमार्ग या परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और विस्थापन के सवालों को उठाना भी जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि क्या हर विरोध वास्तव में स्थानीय हितों से जुड़ा है या कहीं-कहीं किसी परियोजना को लगातार रोकने के लिए संगठित अभियान चलाया जा रहा है। अदालत में जाना या सवाल उठाना अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब है जब तथ्यों के बजाय राजनीतिक एजेंडा, अपारदर्शी वित्तीय हित या बिना पर्याप्त आधार के अभियान सामने आएं। कुडनकुलम परमाणु परियोजना को लेकर अतीत में विदेशी वित्तपोषण और विरोध के संबंध पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी चिंता जताई थी। इससे कम से कम इतना स्पष्ट है कि विदेशी फंडिंग और संगठित विरोध का सवाल किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं रहा है।देश के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एनजीओ की भूमिका को लेकर भी संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत के काम में ऐसे संगठन उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन उन्हीं क्षेत्रों में काम करने वाले संगठनों के वित्तीय स्रोतों और गतिविधियों में पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सीमा क्षेत्रों में सड़क, पुल, सुरंग और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं केवल आर्थिक परियोजनाएं नहीं हैं। उनका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से भी हो सकता है। इसलिए किसी परियोजना पर सवाल उठाने वाले संगठन को राष्ट्र-विरोधी बताना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि कानून का उल्लंघन, वित्तीय अनियमितता या विदेशी हितों के लिए काम करने के प्रमाण मिलते हैं तो जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।एनजीओ गतिविधियों को भारत की GDP वृद्धि में 2-3 प्रतिशत की कथित कमी से जोड़ने जैसे दावे समय-समय पर सामने आते हैं। लेकिन ऐसे दावों को तथ्य मानने से पहले मूल अध्ययन, डेटा और उसकी कार्यप्रणाली की जांच आवश्यक है। किसी देश की आर्थिक वृद्धि पर एनजीओ या विरोध प्रदर्शनों के प्रभाव को अलग करके मापना बेहद जटिल है। इसलिए बहस को मजबूत बनाने के लिए नारे नहीं, प्रमाण और आंकड़े जरूरी हैं।यहां स्टार्टअप और एनजीओ के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। स्टार्टअप को लगातार बाजार की परीक्षा से गुजरना पड़ता है। उसे उत्पाद बनाना होता है, ग्राहक हासिल करने होते हैं, निवेश आकर्षित करना होता है और परिणाम देना होता है। असफल होने पर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। एनजीओ क्षेत्र में भी यही परिणाम आधारित सोच अधिक मजबूती से लागू होनी चाहिए। केवल गतिविधियां, प्रेस विज्ञप्तियां, अभियान या सोशल मीडिया उपस्थिति किसी संगठन की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकती। भारत को ऐसे एनजीओ चाहिए जो वास्तविक सामाजिक समस्याओं का समाधान करें, न कि केवल फंडिंग जुटाने और अभियान चलाने तक सीमित रहें। दूसरी ओर, जो संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत या गरीबों के लिए जमीन पर प्रभावी काम कर रहे हैं, उन्हें अधिक समर्थन और सहयोग मिलना चाहिए।भारत को एनजीओ बनाम स्टार्टअप की कृत्रिम लड़ाई खड़ी करने की जरूरत नहीं है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि देश की सीमित पूंजी, प्रतिभा और संस्थागत ऊर्जा से अधिकतम सामाजिक और आर्थिक परिणाम कैसे हासिल किए जाएं। अगर कोई स्टार्टअप नए रोजगार पैदा कर रहा है, नई तकनीक विकसित कर रहा है और आर्थिक गतिविधि बढ़ा रहा है तो उसे अनावश्यक बाधाओं से बचाना जरूरी है। उसी तरह कोई एनजीओ यदि समाज के कमजोर वर्गों तक शिक्षा, स्वास्थ्य या राहत पहुंचा रहा है तो उसे भी सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए। लेकिन एनजीओ होना जवाबदेही से छूट का प्रमाण नहीं हो सकता। जिस तरह कंपनियों से उनके वित्तीय प्रदर्शन और नियामकीय अनुपालन पर सवाल किए जाते हैं, उसी तरह बड़े पैमाने पर फंड प्राप्त करने वाले सामाजिक संगठनों से भी उनके स्रोत, खर्च और परिणामों पर सवाल होना चाहिए। भारत की अगली आर्थिक छलांग केवल बड़ी कंपनियों से नहीं आएगी। वह लाखों उद्यमियों, स्टार्टअप्स, छोटे कारोबारों और नए रोजगारों से बनेगी। इसलिए नीति का लक्ष्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए जहां विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहे, लेकिन अपारदर्शिता को संरक्षण न मिले; सामाजिक कार्य को प्रोत्साहन मिले, लेकिन उसके नाम पर जवाबदेही से बचने की गुंजाइश न हो; और उद्यमिता को वह जगह मिले जिसकी उसे आर्थिक विकास के अगले चरण में जरूरत है।आखिरकार सवाल यह नहीं है कि भारत में एनजीओ कितने हैं और स्टार्टअप कितने। असली सवाल यह है कि इन संस्थाओं से देश को कितना वास्तविक लाभ मिल रहा है। आने वाले भारत में संख्या से ज्यादा महत्व परिणाम का होना चाहिए कितने रोजगार बने, कितने लोगों की जिंदगी बदली, कितनी नई तकनीक आई और कितनी आर्थिक तथा सामाजिक क्षमता पैदा हुई। यही वह कसौटी है जिस पर भारत की संस्थागत ऊर्जा को परखा जाना चाहिए।                                लेखक योगेश सोनी, वरिष्ठ पत्रकार

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