नई दिल्ली-दिल्ली के व्यस्त और संकरे सदर बाजार में, जो एशिया के सबसे बड़े थोक बाजारों में से एक है, वर्ष 1968 में स्थापित ‘रिखबदास जैन एंड संस’ को आज सोरभ जैन और ऋषि जैन चला रहे हैं। इस फर्म ने पीढ़ियों से भरोसे, रिश्तों और अपने गोदाम से गुजरने वाली हर चीज व हर सप्लायर की गहरी जानकारी के दम पर अपनी साख बनाई है। लेकिन जैसे-जैसे भारत में जीएसटी और ई-इनवॉइसिंग की व्यवस्था लागू हुई और हर महीने कंप्लायंस की समयसीमाएं सिर पर आने लगीं, पारंपरिक तौर-तरीकों की सीमाएं दिखने लगीं।सालों तक फर्म के इन्वेंट्री रिकॉर्ड किसी एक भरोसेमंद जगह के बजाय अलग-अलग रजिस्टरों और याददाश्त में बिखरे रहते थे। स्टॉक की सटीकता महज 55% के आसपास रहती थी, जो रोजमर्रा के कारोबार के लिए तो काफी थी, पर तब मुश्किल खड़ी कर देती थी जब कोई ग्राहक ऐसी मात्रा मांग बैठता जो असल में शेल्फ पर थी ही नहीं, या मिलान में कोई ऐसा अंतर निकल आता जिसकी वजह किसी को समझ न आती। इसके अलावा, हर बिक्री का इनवॉइस बनाने के बाद सरकारी पोर्टल पर जाकर ई-वे बिल और ई-इनवॉइस अलग से बनाना पड़ता था। इस काम में हर दस्तावेज पर 10 से 15 मिनट लगते थे, साथ ही छोटी-छोटी गलतियों की गुंजाइश रहती थी, जैसे जीएसटी की गलत दर या कर योग्य रकम की गलत गणना, जो पूरे महीने में जुड़कर असली आर्थिक जोखिम बन जाती थीं।सबसे ज्यादा दबाव दो मौकों पर पड़ता था: ऑडिट के समय और हर महीने जीएसटी रिटर्न भरते वक्त। चार्टर्ड अकाउंटेंट को जिस खास फॉर्मेट में एक्सेल शीट चाहिए होती थी, उसे तैयार करने में ही कर्मचारियों के 18 से 20 घंटे निकल जाते थे। जीएसटी मिलान और रिटर्न फाइलिंग में हर महीने 6 से 7 घंटे और लगते थे, क्योंकि ऑडिटर को भेजने से पहले बिक्री और खरीद का हर इनवॉइस हाथ से जांचा जाता था। हाथ से की गई इस जांच में कई इनवॉइस छूट जाते थे, जिससे फर्म अपना पूरा इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम नहीं कर पाती थी और सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था।रोजमर्रा के कारोबारी फैसलों में भी एक छिपा हुआ बोझ था। किसी सप्लायर के मौजूदा कोटेशन की तुलना पिछली खरीद की कीमत से करने के लिए पुराने बिल खंगालने पड़ते थे, यानी एक झटपट लिए जाने वाले फैसले के लिए 18 मिनट की बेवजह की देरी। रोजाना की एमआईएस और बिजनेस रिपोर्ट, जो खरीद-बिक्री के फैसलों में असल मदद करती हैं, उन्हें तैयार करने में हर दिन ढाई घंटे लग जाते थे, और तब तक वह “रोजाना” की रिपोर्ट कल की खबर बन चुकी होती थी।बदलाव तब आया जब ‘रिखबदास जैन एंड संस’ ने अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर कंपनी बिजी (BUSY) के अकाउंटिंग और इन्वेंट्री सॉफ्टवेयर को अपने कारोबार में उतारा। मकसद काम करने के पूरे तरीके को बदलना नहीं था, बल्कि मौजूदा तरीकों को ही तेज और साफ-सुथरा बनाना था। रियल-टाइम इन्वेंट्री ट्रैकिंग से स्टॉक की सटीकता 55% से बढ़कर 96% हो गई, यानी बहीखाते में जो लिखा था और शेल्फ पर जो असल में रखा था, उसका फासला लगभग खत्म हो गया। ई-वे बिल और ई-इनवॉइस, जो पहले हर लेनदेन पर 10 से 15 मिनट का हाथ का काम थे, अब बिजी के भीतर ही एक मिनट से भी कम समय में बन जाते हैं। इससे यह काम 90% तक घट गया और डेटा दोबारा भरने में होने वाली गलतियां पूरी तरह खत्म हो गईं।ऑडिट का दबाव भी काफी हद तक कम हो गया है। बिजी में ही रिपोर्ट के कॉलम अपनी जरूरत के हिसाब से बदलकर फर्म अब सीए के लिए ऑडिट डेटा 18 से 20 घंटों के बजाय सिर्फ 2 से 3 घंटों में तैयार कर लेती है। जीएसटी मिलान, जिसमें पहले हर महीने 6 से 7 घंटे लगते थे और आईटीसी के दावे छूटने का खतरा रहता था, अब ऑटोमेटेड रिपोर्टिंग से करीब 1.5 घंटे में पूरा हो जाता है। सप्लायर की कीमतों की तुलना, जिसमें पहले 18 मिनट लगते थे, अब सिर्फ 25 सेकंड में हो जाती है, और रोजाना की एमआईएस रिपोर्ट, जिन्हें हाथ से जोड़ने में ढाई घंटे लगते थे, अब तुरंत उपलब्ध हो जाती हैं। इन सभी बदलावों से फर्म को सालाना करीब 2,50,000 रुपये की बचत का अनुमान है।दिल्ली के सबसे पुराने थोक बाजार में पीढ़ियों के भरोसे पर खड़ी इस फर्म के लिए यह बदलाव उस चीज को छोड़ने का नहीं था जो काम कर रही थी; बल्कि अपने दशकों पुराने कारोबारी अनुभव को उसके लायक रियल-टाइम आंकड़े देने का था। सदर बाजार में, जहां मार्जिन पतले हैं और रफ्तार मायने रखती है, विरासत और रियल-टाइम जानकारी का यह मेल ‘रिखबदास जैन एंड संस’ की एक खामोश ताकत बन गया है।

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