नई दिल्ली – क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा विरासत का संरक्षण एवं आजीविका का संवर्धन विषय के साथ भौगोलिक संकेतक (GI) दिवस मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ कारीगरों एवं उत्पादक समुदायों के लिए सतत आजीविका के अवसर सृजित करने में GI की भूमिका को रेखांकित करना था।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. (डॉ.) उन्नत पी. पंडित, नियंत्रक-जनरल, पेटेंट, डिज़ाइन एवं ट्रेड मार्क्स, DPIIT, भारत सरकार ने की। कार्यक्रम में श्री पुष्पस पांडे, प्रबंध निदेशक, NABCONS; श्री टी.डी. शिवकुमार, मुख्य महाप्रबंधक, EXIM बैंक श्री डी. साहू, महाप्रबंधक एवं संयोजक, SLBC श्री नटराजन रामचंद्रन, महाप्रबंधक, SIDBI; RBI, बैंकों एवं विभिन्न सरकारी विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ कारीगरों एवं अन्य हितधारकों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान GI मान्यता के लिए आगे बढ़ाए जा रहे दिल्ली के छह पारंपरिक शिल्पों पर आधारित एक लघु फिल्म का शुभारंभ तथा नाबार्ड की GI यात्रा को संकलित करने वाली कॉफी टेबल बुक का विमोचन किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत नाबार्ड, नई दिल्ली क्षेत्रीय कार्यालय में GI बाज़ार का भी आयोजन किया गया, जिसमें दिल्ली तथा राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों के कारीगरों द्वारा 22 स्टॉल लगाए गए हैं। GI एवं पारंपरिक उत्पादों के प्रदर्शन एवं विपणन के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर रहा है।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री नवीन कुमार रॉय, मुख्य महाप्रबंधक, नाबार्ड, नई दिल्ली क्षेत्रीय कार्यालय ने दिल्ली में नाबार्ड की GI पहल के विस्तार को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष चिन्हित तीन उत्पादों से बढ़कर अब दिल्ली के नौ उत्पादों को GI मान्यता के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि GI प्रमाणन केवल शुरुआत है और इसके लिए संस्थागत वित्त, कौशल उन्नयन, ब्रांडिंग एवं बाजार तक पहुंच सहित एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने नाबार्ड के हेरिटेज फाइनेंसिंग पर विशेष जोर देते हुए आर्टिजन क्रेडिट कार्ड और PM विश्वकर्मा जैसी वित्तीय सुविधाओं को जमीनी स्तर पर कारीगरों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बेहतर बाजार, उचित मूल्य एवं सतत आजीविका सुनिश्चित करने के लिए कारीगरों के बीच परस्पर सीख तथा बैंकों एवं अन्य संस्थाओं के साथ समन्वय के महत्व को भी रेखांकित किया।कार्यक्रम के दौरान हुई चर्चाओं में इस बात पर जोर दिया गया कि GI पंजीकरण के बाद अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में पंजीकरण, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिजिटल मार्केटिंग, लॉजिस्टिक्स एवं बाजार संपर्क जैसी गतिविधियों को आगे बढ़ाना आवश्यक है। स्थानीय बाजारों से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक GI उत्पादों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नाबार्ड, बैंकों, SIDBI, EXIM बैंक, सरकारी एजेंसियों एवं उत्पादक समुदायों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण बताया गया। उत्पादों की ट्रेसबिलिटी एवं QR आधारित प्रमाणीकरण से उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने तथा GI उत्पादों के मूल्य को बेहतर करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।कारीगरों ने अपने अनुभव साझा करते हुए निरंतर बाजार उपलब्धता, संस्थागत वित्त, बेहतर पैकेजिंग एवं निर्यात के अवसरों की आवश्यकता को रेखांकित किया। उनके अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ कि निरंतर संस्थागत सहयोग, प्रदर्शनियों एवं बाजार संपर्क के माध्यम से पारंपरिक शिल्पों को सुदृढ़ आजीविका के रूप में विकसित करने तथा युवा पीढ़ी को इन शिल्पों से जोड़ने में सहायता मिल सकती है।अपने संबोधन में प्रो. (डॉ.) उन्नत पी. पंडित ने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं सतत आजीविका के सृजन में GI के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि अब तक 833 भारतीय GI उत्पाद पंजीकृत किए जा चुके हैं और समन्वित प्रयासों के माध्यम से 10,000 GI के लक्ष्य को प्राप्त करने की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने हिंदी एवं अंग्रेजी में GI आवेदनों की ऑनलाइन फाइलिंग एवं ट्रैकिंग की सुविधा प्रदान करने वाले आगामी GI पोर्टल की जानकारी दी तथा GI पंजीकरण के लिए जमीनी स्तर पर सहयोग को मजबूत करने की पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रदर्शनियों, उपहारों एवं GI डिप्लोमेसी के माध्यम से GI उत्पादों के व्यापक प्रचार की आवश्यकता पर बल दिया तथा विशेष रूप से युवाओं से विरासत संरक्षण एवं आजीविका संवर्धन के लिए GI को एक सतत अभियान बनाने का आह्वान किया।कार्यक्रम का समापन GI पंजीकरण से आगे बढ़कर GI आधारित आजीविका, उद्यम विकास एवं बाजार सृजन की दिशा में सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ हुआ, ताकि भारत का पारंपरिक ज्ञान एवं शिल्प कौशल उन समुदायों के लिए सतत समृद्धि का आधार बन सके, जो इन्हें पीढ़ियों से संरक्षित करते आए हैं।
