नई दिल्ली -बैंक खाता देखने में एक छोटा-सा साधन प्रतीत हो सकता है, किंतु इसका वास्तविक महत्व इससे मिलने वाले अवसरों में निहित है, जिन्हें यह उपलब्ध कराता है। इसके माध्यम से पैसा प्राप्त किया जा सकता है तथा सुरक्षित रखा जा सकता है, बचत की जा सकती है, भुगतान किए जा सकते हैं और सरकारी लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुँचाए जा सकते हैं। यही खाता आगे चलकर बीमा, पेंशन और ऋण जैसी वित्तीय सेवाओं तक पहुँच का बुनियादी आधार भी बन सकता है।हमारे जैसे विशाल देश में प्रत्येक परिवार को बुनियादी बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ना एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। भारत वर्ष 2014 से पहले भी वित्तीय समावेशन की दिशा में अनेक वर्षों से प्रयासरत था। तथापि, आसपास में बैंक की उपलब्धता और बैंक में अपना खाता होने के बीच एक बड़ा फासला था। वर्ष 2011 में भारत के 24.67 करोड़ परिवारों में से केवल 14.48 करोड़ परिवारों को ही बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध थीं। वर्ष 2014 तक 53.1 प्रतिशत वयस्क नागरिकों के पास अपना बैंक खाता हो गया, जबकि वर्ष 2011 में यह 35.2 प्रतिशत था। महिलाओं में, खाता स्वामित्व 43.1 प्रतिशत था।इसी फासले को पाटने के उद्देश्य से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जन धन योजना का शुभारंभ किया गया। यह कार्यक्रम चार प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित था—बैंकिंग सुविधाओं से वंचित व्यक्तियों को बैंकिंग सुविधा प्रदान करना (बैंकिंग द अनबैंकड), बीमा से वंचित व्यक्तियों को बीमा सुविधा प्रदान करना (सिक्योरिंग द अनसिक्योरड), गैर-वित्तपोषितों को वित्तपोषण प्रदान करना (फंडिंग द अनफंडेड) तथा वंचितों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान करना (सर्विंग द अंडरसर्व्ड)। पीएमजेडीवाई ने करोड़ों ऐसे व्यक्तियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा, जो पहले इससे बाहर थे और यह योजना भारत की प्रमुख वित्तीय समावेशन योजना के रूप में उभरी तथा नागरिकों को बैंकिंग, बीमा, पेंशन योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल भुगतान से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनी।बारह वर्षों में पीएमजेडीवाई विश्व की एक सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल बन चुकी है। 1 जुलाई 2026 तक 58.63 करोड़ खातों तथा ₹3.08 लाख करोड़ की जमा राशि के साथ इस योजना ने अपने व्यापक पैमाने का प्रदर्शन किया है। विश्व बैंक की ग्लोबल फिन्डेक्स 2025 के अनुसार,भारत में वर्ष 2024 में 89 प्रतिशत वयस्कों के पास बैंक खाता था, जबकि वर्ष 2011 में यह आँकड़ा केवल 35.2 प्रतिशत था। उपलब्ध आँकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय रिज़र्व बैंक के वित्तीय समावेशन सूचकांक मार्च 2017 में 43.4 के स्तर से मार्च 2026 में बढ़कर 70 तक पहुँचने के साथ-साथ प्रधानमंत्री जन धन खातों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हुई।इंडियन बैंक ने पीएमजेडीवाई खातों में 4.24 प्रतिशत की बाजार हिस्सेदारी के साथ एक बड़ा योगदान दिया है। जुलाई 2026 तक बैंक में पीएमजेडीवाई के अंतर्गत जमाराशि वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 18 प्रतिशत बढ़कर ₹13,901 करोड़ हो गई। प्रति पीएमजेडीवाई खाते में ₹5,224 का औसत जमा शेषराशि यह दर्शाती है कि ये खाते सक्रिय बचत खातों के रूप में परिचालित हो रहे हैं।पीएमजेडीवाई ने बैंक खाते से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं के व्यापक उपयोग की आधारशिला तैयार की है। खाताधारकों की संख्या बढ़ने से भारत में डिजिटल भुगतान के विस्तार को आधार मिला और आगे चलकर यूपीआई ने नागरिकों के लिए सरल, तेज और सुगम लेनदेन को संभव बनाया।।यह खाते पीएमजेजेबीवाई , पीएमएसबीवाई तथा एपीवाई जैसी योजनाओं के अंतर्गत बीमा एवं पेंशन कवरेज का विस्तार का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गए हैं। 1 जुलाई 2026 तक पीएमजेजेबीवाई के अंतर्गत 27.84 करोड़ तथा पीएमएसबीवाई के अंतर्गत 58.78 करोड़ पंजीकरण हो चुके थे, जबकि 30 जून 2026 तक एपीवाई के अंतर्गत पंजीकरण 9.29 करोड़ तक पहुँच गया था। इंडियन बैंक में यह आँकड़े क्रमशः 1.14 करोड़, 2.32 करोड़ और 0.53 करोड़ हैं। औपचारिक वित्तीय सेवाओं की पहुँच के साथ प्रधानमंत्री स्वनिधि तथा प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी ऋण योजनाओं के माध्यम से भी ऋण सुविधाओं का विस्तार हुआ।प्रधानमंत्री जन धन योजना महिलाओं के सशक्तीकरण का एक प्रभावी माध्यम भी बनकर उभरी है। कुल खाताधारकों में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हैं। उनके अपने नाम पर बैंक खाते होने से महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता, बचत क्षमता और घरेलू वित्त पर नियंत्रण मजबूत हुआ है। साथ ही, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे उनके खातों में पहुंचने से उनकी आर्थिक भागीदारी भी बढ़ी है।
पीएमजेडीवाई ने वित्तीय समावेशन के अगले चरण के लिए एक मजबूत आधारशिला रखी है। अब आवश्यकता यह है कि इसे अब और अधिक गहन, उपयोगी तथा उत्तरदायी बनाया जाए। अकाउंट एग्रीगेटर के साथ समर्थित यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस के जरिए ऋण मूल्यांकन प्रक्रिया को और तेज बनाया जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता बैंकों को ग्राहकों की आवश्यकताओं, जोखिमों तथा धोखाधड़ी के पैटर्न को बेहतर ढंग से समझने में सहायता कर सकती है। बैंकिंग भाषिणी, भाषा संबंधी बाधाओं को दूर कर वित्तीय सेवाओं तक पहुँच को और अधिक सुगम बना सकती है।अब हमारी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि वित्तीय पहुंच और प्रौद्योगिकी का लाभ वास्तविक वित्तीय कल्याण में परिवर्तित हो। बैंकों को ग्राहक-केंद्रित नवाचार पर ध्यान देना होगा तथा सेवाओं को सुलभ, किफायती और पारदर्शी बनाए रखना होगा। ग्राहक संरक्षण, डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, वित्तीय साक्षरता और शिकायत निवारण पर आगे और अधिक ध्यान देना होगा। साथ ही, ग्राहकों को भी वित्तीय सेवाओं का समझदारी से उपयोग करना होगा, अपनी गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखनी होगी, धोखाधड़ी के प्रति सतर्क रहना होगा और सोच-समझकर वित्तीय निर्णय लेने होंगे ।प्रधानमंत्री जन धन योजना के बारह वर्षों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीति, बैंकिंग और प्रौद्योगिकी एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब वित्तीय समावेशन आर्थिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। प्रत्येक नागरिक को बैंक खाता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रारंभ हुई यह सफर आज बचत, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल भुगतान और औपचारिक ऋण तक आम जनता की पहुँच का व्यापक माध्यम बन चुकी है। यदि पहले बारह वर्ष लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने के लिए समर्पित थे, तो आने वाले वर्षों का उद्देश्य उन्हें इस प्रणाली का प्रभावी उपयोग कर अपने सामाजिक-आर्थिक कल्याण को सुदृढ़ बनाने में सक्षम बनाना होना चाहिए। यह इसलिए भी आवश्यक है कि वित्तीय रूप से सशक्त नागरिक ही एक समावेशी, समृद्ध भारत तथा विकसित भारत के राष्ट्रीय संकल्प की मजबूत आधारशिला बनेंगे।श्री बिनोद कुमार प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी, इंडियन बैंक

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