नई दिल्ली- सालों तक मुझे लगता रहा कि हाथों का कांपना मेरी जिंदगी का हिस्सा है और मुझे इसके साथ ही जीना होगा। मुझे कभी पता ही नहीं था कि इसके एडवांस इलाज के विकल्प भी मौजूद हैं। आज डॉक्टरों से इलाज की संभावनाओं के बारे में सुनकर और उन मरीजों से मिलकर, जो यह इलाज करा चुके हैं, मैं पहली बार उम्मीद लेकर लौट रहा हूं। वट्टीकुटी फाउंडेशन के न्यूरोनेक्स्ट फोरम में शामिल एक प्रतिभागी की यह भावुक प्रतिक्रिया उन लाखों लोगों की हकीकत को सामने लाती है, जो मूवमेंट डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं। इनमें से कई लोगों को इलाज के नए विकल्पों की जानकारी नहीं होती और न ही उन्हें भरोसेमंद मेडिकल सलाह आसानी से मिल पाती है। इस साल की थीम फोकस्ड अल्ट्रासाउंड के जरिए जिंदगी को फिर से बेहतर बनाना पर आधारित वट्टीकुटी फाउंडेशन ने न्यूरोनेक्स्ट फोरम की नई श्रृंखला का सफल आयोजन किया। यह देशव्यापी मरीज जागरूकता अभियान अहमदाबाद, चेन्नई, दिल्ली और चंडीगढ़ में आयोजित हुआ, जिसमें 400 से ज्यादा मरीजों, उनके परिजनों और देखभाल करने वाले लोगों ने हिस्सा लिया। प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट्स और न्यूरोसर्जन्स से सीधे संवाद के जरिए प्रतिभागियों ने पार्किंसन डिजीज, एसेंशियल ट्रेमर और इलाज के नए विकल्पों को बेहतर तरीके से समझा, ताकि वे अपने इलाज को लेकर ज्यादा जागरूक और सही निर्णय ले सकें।फोरम में देश के कई प्रमुख न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ शामिल हुए। इनमें अहमदाबाद स्थित एसएमटी. एनएचएल म्यूनिसिपल मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर वी. शाह, कोयंबटूर के रॉयल केयर सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरोसोनोलॉजिस्ट डॉ. के. विजयन, दीनानाथ मंगेशकर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के कंसल्टेंट फंक्शनल न्यूरोसर्जन डॉ. अनिरुद्ध भगवत, हैदराबाद के किम्स हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मानस कुमार पाणिग्रही, नई दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी विभाग की सीनियर कंसल्टेंट और को-चेयरपर्सन डॉ. अंशु रोहतगी तथा वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजिकल साइंसेज विभाग के प्रोफेसर डॉ. आतिफ शेख सहित कई अन्य विशेषज्ञ मौजूद रहे। चारों शहरों में आयोजित न्यूरोनेक्स्ट फोरम में 125 से ज्यादा हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने भी भाग लिया। इससे डॉक्टरों, मरीजों और उनके परिजनों के बीच सार्थक संवाद का अवसर मिला।चर्चा का एक प्रमुख विषय मैग्नेटिक रेजोनेंस गाइडेड फोकस्ड अल्ट्रासाउंड (एमआरजीएफयूएस) रहा, जो मूवमेंट डिसऑर्डर से पीड़ित कुछ चुनिंदा मरीजों के लिए बिना चीरा लगाए किया जाने वाला नॉन-इनवेसिव इलाज है। सत्रों के दौरान प्रतिभागियों को इस तकनीक के वैज्ञानिक आधार, किन मरीजों के लिए यह उपयुक्त है, इससे मिलने वाले संभावित परिणाम और समय रहते विशेषज्ञ से सलाह लेने के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि फिजियोथेरेपी, नियमित व्यायाम, रिहैबिलिटेशन और जीवनशैली में बदलाव लंबे समय तक बेहतर जीवन गुणवत्ता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। एमआरजीएफयूएस को लेकर जागरूकता बढ़ने के साथ अब यह इलाज भारत के चार केंद्रों पर उपलब्ध है। इनमें कोयंबटूर का रॉयल केयर सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल शामिल है, जहां 2022 में यह तकनीक शुरू की गई थी और अब तक 300 से ज्यादा मरीजों का सफल इलाज हो चुका है। नई दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पिटल में 2025 में रॉयल केयर की एमआरजीएफयूएस टीम के तकनीकी सहयोग से यह कार्यक्रम शुरू हुआ और यहां अब तक 25 से ज्यादा प्रक्रियाएं पूरी की जा चुकी हैं। हैदराबाद के किम्स हॉस्पिटल में 2025 से यह सुविधा शुरू होने के बाद 55 से ज्यादा सफल इलाज किए जा चुके हैं। वहीं, वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में वट्टीकुटी फाउंडेशन के सहयोग से 2026 में सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन न्यूरोटेक्नोलॉजी की स्थापना की गई, जहां जटिल मूवमेंट डिसऑर्डर से पीड़ित मरीजों के लिए बिना चीरे वाला एडवांस इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है।इस पहल के महत्व पर बात करते हुए वट्टीकुटी फाउंडेशन के वाइस प्रेसिडेंट अभि वट्टीकुटी ने कहा,जानकारी मरीजों को बेहतर फैसले लेने की ताकत देती है और हर मरीज को अपने इलाज के सभी भरोसेमंद और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विकल्पों की जानकारी मिलनी चाहिए। न्यूरोनेक्स्ट फोरम के जरिए हमारा उद्देश्य मेडिकल विशेषज्ञों और मरीजों के बीच की दूरी को कम करना है। हमने ऐसा मंच तैयार किया है, जहां मरीज और उनके परिजन देश के प्रमुख विशेषज्ञों से सीधे बात कर सकें, खुलकर सवाल पूछ सकें और अपने इलाज की पूरी प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ सकें। अलग-अलग शहरों में मिला उत्साहजनक प्रतिसाद बताता है कि इस तरह की जागरूकता की लगातार जरूरत है। हम आगे भी ऐसे प्रयास जारी रखेंगे, ताकि ज्यादा से ज्यादा परिवार जानकारी, भरोसे और नई उम्मीद के साथ भविष्य की ओर बढ़ सकें।
