1. सेंटिएंट वास्तव में क्या काम करता है? डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्र में इन जाँचों को करने के पीछे आपका मुख्य उद्देश्य क्या है? इन क्षेत्रों में जाँच के दौरान आपको सबसे बड़ी चिंताएँ क्या देखने को मिलीं?सेंटिएंट एक पशु संरक्षण संस्था है, जो जाँच के माध्यम से यह सामने लाने का काम करती है कि जानवरों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जा रहा है और फिर इस जानकारी के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की दिशा में काम करती है।भारत में हम अलग-अलग क्षेत्रों में जाँच करते हैं और पशु संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करते हैं, ताकि जाँच से सामने आए तथ्यों और प्रमाणों का इस्तेमाल लोगों को जागरूक करने, अभियानों, कानूनी कार्रवाई और नीतिगत बदलावों के लिए किया जा सके। इसके साथ ही हम भारत में पशु संरक्षण के क्षेत्र में जाँच करने की क्षमता को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए जाँचकर्ताओं को प्रशिक्षण, आवश्यक उपकरण, कानूनी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता तथा पेशेवर नेटवर्क उपलब्ध कराने पर काम किया जा रहा है।हमारा उद्देश्य केवल किसी एक मामले में जानवरों के साथ हुई क्रूरता को सामने लाना नहीं है। हमारा प्रयास यह समझना है कि ऐसी समस्याएँ कितने व्यापक स्तर पर मौजूद हैं, उन्हें विश्वसनीय प्रमाणों के साथ दर्ज करना और फिर यह सुनिश्चित करना कि ये प्रमाण उन लोगों और संस्थाओं तक पहुँचें, जो इनके आधार पर कार्रवाई कर सकते हैं।वर्ष 2026 में हमारी डेयरी क्षेत्र की जाँच छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 102 इकाइयों में की गई। वहीं, पोल्ट्री क्षेत्र में पंजाब, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु की 21 व्यावसायिक इकाइयों की जाँच की गई।डेयरी इकाइयों में हमने कई गंभीर समस्याएँ देखीं। इनमें जरूरत से अधिक संख्या में पशुओं को रखना, लंबे समय तक बांधकर रखना और उनकी आवाजाही सीमित करना, पर्याप्त आश्रय और हवा की व्यवस्था न होना, चोटें, त्वचा संबंधी संक्रमण, कुपोषण के संकेत, साफ-सफाई की खराब व्यवस्था और पशु चिकित्सकों की सीमित भागीदारी जैसी समस्याएँ शामिल थीं।हमने ऑक्सीटोसिन के इस्तेमाल और ‘खल बच्चा’ जैसी प्रथाओं को भी दर्ज किया। इसमें दूध उतारने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए एक नकली बछड़े का इस्तेमाल किया जाता है।साफ-सफाई और पर्यावरण से जुड़ी गंभीर समस्याएँ भी सामने आईं। कुछ स्थानों पर खुले नालों, कचरे और सीवेज के पास ही दूध निकाला जा रहा था। गोबर के उचित निपटान की व्यवस्था नहीं थी, गंदा पानी बह रहा था और कुछ स्थानों पर मृत पशुओं के शव भी पड़े मिले।पोल्ट्री इकाइयों में हमने पिंजरों में बहुत अधिक संख्या में पक्षियों को रखने, चोटों और खराब स्वास्थ्य, नियमित रूप से चोंच काटने, साफ-सफाई की खराब व्यवस्था, बड़ी मात्रा में जमा होते मल, कीड़े-मकौड़ों, कचरे के अनुचित प्रबंधन और बेहद कमजोर पक्षियों जैसी समस्याएँ देखीं।सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ये समस्याएँ केवल एक-दो स्थानों तक सीमित नहीं थीं। अलग-अलग क्षेत्रों में एक जैसी प्रथाएँ देखने को मिलीं। इससे पशु कल्याण की निगरानी, नियमों के पालन, पशु चिकित्सा सेवाओं और जवाबदेही को लेकर व्यापक चिंताएँ सामने आती हैं।2. सेंटिएंट के अनुभव के आधार पर, भारत में पशु कल्याण और खाद्य उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाने के लिए किस तरह के बदलाव जरूरी हैं?खाद्य उत्पादन और पशु कल्याण को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए। सबसे पहली आवश्यकता यह है कि भोजन के लिए पाले जाने वाले जानवरों को अनावश्यक पीड़ा से बचाया जाए और पशु कल्याण, पर्यावरण तथा जनस्वास्थ्य से जुड़े मौजूदा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।हमारी जाँच से यह स्पष्ट हुआ है कि पशुओं के लिए बेहतर आवास और हवा की व्यवस्था, पर्याप्त जगह और आवाजाही की सुविधा, साफ पानी और उचित भोजन, नियमित पशु चिकित्सा देखभाल, सुरक्षित तरीके से पशुओं को संभालना, बेहतर साफ-सफाई और गोबर, गंदे पानी तथा मृत पशुओं के उचित निपटान की व्यवस्था बेहद जरूरी है।इसके साथ ही निगरानी व्यवस्था को भी अधिक मजबूत और नियमित बनाने की आवश्यकता है।हमारी डेयरी क्षेत्र की जाँच में ऐसी कई इकाइयाँ सामने आईं जो रिहायशी इलाकों, सड़कों और जल स्रोतों के आसपास चल रही थीं। वहाँ नियमित निगरानी या नियमों के उल्लंघन होने पर सुधारात्मक कार्रवाई के बहुत कम संकेत दिखाई दिए।वहीं, कुछ डेयरी संचालकों ने यह भी बताया कि उन्हें पशु चिकित्सकों की सेवाओं, टीकाकरण कार्यक्रमों और अन्य जरूरी सहायता तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिलती।इसलिए केवल नियमों को सख्ती से लागू करना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ पशुपालकों और उत्पादकों को सही जानकारी, व्यावहारिक मार्गदर्शन और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध करानी होगी।
पारदर्शिता भी बेहद महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र जाँच से जमीनी स्थिति सामने आती है और सरकार, उद्योग, पशु संरक्षण संस्थाओं, पत्रकारों तथा कानूनी क्षेत्र से जुड़े लोगों को ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिनके आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।हमारा उद्देश्य यही होना चाहिए कि जाँच से सामने आए प्रमाण केवल रिपोर्ट तक सीमित न रहें, बल्कि उनके आधार पर नियमों का पालन सुनिश्चित हो, कानूनी और नीतिगत कार्रवाई हो, लोगों में जागरूकता बढ़े और पशु कल्याण की स्थिति में वास्तविक सुधार आए। 3.आगे सेंटिएंट किन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और पशु कल्याण के क्षेत्र में किस तरह का बदलाव लाना चाहता है?आने वाले समय में सेंटिएंट डेयरी और पोल्ट्री जैसे प्रमुख क्षेत्रों में अपनी जाँच जारी रखेगा। इसके साथ ही हम उन क्षेत्रों में भी काम बढ़ाना चाहते हैं, जिनके बारे में अभी पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इनमें जलीय जीव पालन, सूअर, बकरी, ऊँट, बत्तख और जीवित पशुओं के बाजार जैसे क्षेत्र शामिल हैं। हालाँकि, हम यह भी मानते हैं कि केवल जाँच करना ही पर्याप्त नहीं है।भारत में पशुओं से जुड़े मामलों की पेशेवर तरीके से जाँच करने वाले प्रशिक्षित लोगों की संख्या अभी बहुत कम है। इसके अलावा आवश्यक उपकरण, कानूनी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता, प्रशिक्षण और स्थायी रोजगार के अवसरों तक भी उनकी पहुंच सीमित है।एक और बड़ी चुनौती यह है कि कई बार जाँचकर्ताओं के पास महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं, लेकिन यदि उनका संपर्क उन संस्थाओं से नहीं है जो जनजागरूकता, मीडिया, नीतिगत बदलाव और कानूनी कार्रवाई के क्षेत्र में काम करती हैं, तो ये प्रमाण आगे की कार्रवाई में इस्तेमाल नहीं हो पाते।इसीलिए सेंटिएंट जाँच करने के साथ-साथ भारत में एक मजबूत जाँच व्यवस्था तैयार करने पर भी काम कर रहा है। इसमें जाँचकर्ताओं को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देना, एक विशेष जाँच प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना, आवश्यक पेशेवर उपकरण और सहायता उपलब्ध कराना तथा जाँचकर्ताओं और पशु संरक्षण संस्थाओं के बीच सहयोग को मजबूत करना शामिल है। यह काम पहले से चल रहा है।हमारा दीर्घकालिक लक्ष्य एक ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें जानवरों के साथ होने वाली पीड़ा को लगातार और विश्वसनीय तरीके से दर्ज किया जाए, प्रमाण सही लोगों और संस्थाओं तक पहुँचें और उन प्रमाणों के आधार पर ठोस कार्रवाई हो।हम चाहते हैं कि इसके माध्यम से लोगों में जागरूकता बढ़े, नियमों का बेहतर पालन हो, कानूनी और नीतिगत स्तर पर कार्रवाई हो, उद्योग और कंपनियों की जवाबदेही तय हो और अंततः जानवरों के जीवन और कल्याण में स्थायी सुधार आए।
