नई दिल्ली- प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीन मूर्ति भवन में भारत सरकार के कोयला मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव एवं वरिष्ठ भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी रूपिंदर बरार के प्रथम उपन्यास ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।कार्यक्रम में ‘महिलाएं, पर्यावरण और संघर्ष से उबरने की कला’ विषय पर परिचर्चा हुई, जिसमें कानून, कूटनीति, साहित्य, खान-पान और पर्यावरण विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों ने विचार रखे।सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने उपन्यास की भावनात्मक गहराई और पर्यावरणीय सरोकारों की सराहना करते हुए महिलाओं की आकांक्षाओं, सामाजिक भागीदारी, जलवायु परिवर्तन और आदिवासी अधिकारों जैसे विषयों का उल्लेख किया। आउटलुक की पूर्व संपादक चिंकी सिन्हा के साथ बातचीत में रूपिंदर बरार ने बताया कि तंजानिया में बिताए वर्षों और ‘ब्लास्ट फिशिंग’ से जुड़ी एक घटना ने उन्हें कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत और पूर्वी अफ्रीका के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों का भी जिक्र किया।लेखिका प्रत्यक्ष सिन्हा ने उपन्यास की नायिका माया को जटिल और प्रभावशाली चरित्र बताते हुए इसे पर्यावरण से आगे नैतिक और मानवीय सवाल उठाने वाली कथा बताया। प्रसिद्ध शेफ रणवीर बरार ने भोजन, लैंगिकता और पर्यावरण संरक्षण के संबंध पर विचार रखे।एथ्नोबॉटनिस्ट डॉ. अमित कौर पुरी ने कोरल रीफ, कोरल ब्लीचिंग और ब्लास्ट फिशिंग के वैज्ञानिक प्रभावों को समझाते हुए लक्षद्वीप, कच्छ के रण तथा अंडमान-निकोबार के कोरल पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण की आवश्यकता बताई। केन्या उच्चायोग की मंत्री विनी म्वानजाला ने आदिवासी अधिकारों, पारंपरिक प्रकृति-संरक्षण और भारत-अफ्रीका के ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डाला।रूपिंदर बरार ने अपनी रचनात्मक प्रक्रिया साझा करते हुए कहा कि उपन्यास के पात्र पिछले दो-तीन वर्षों से उनके साथ रहे हैं। कोनार्क पब्लिशर्स के निदेशक विष्णुकांत रामचंद्रन ने सार्थक और विचारोत्तेजक साहित्य के प्रकाशन को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम का समापन प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ।कोनार्क पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित ‘कोरल्स ब्लूम अगेन’ अब अमेजन पर उपलब्ध है।

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