नई दिल्ली- भूपेंद्र चौधरी, दार्शनिक-वैज्ञानिक (साइंस ऑफ कॉन्शसनेस), लेखक और वक्ता , कहते हैं कि आज के चुनौतीपूर्ण दौर में चिंता, अनिद्रा और अवसाद जैसी समस्याओं से बच्चे, युवा और वयस्क सभी जूझ रहे हैं। मेंटल हेल्थ ऐप्स, कोर्स और रिट्रीट का प्रचलन बढ़ने तथा मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा होने के बावजूद, खुशी और आत्म-संतोष का अनुभव करना कठिन होता जा रहा है। कॉर्पोरेट कर्मचारी बर्नआउट से जूझ रहे हैं, परिवारों में टकराव बढ़ रहा है और विद्यार्थी एकाग्रता खो प्रतिस्पर्धा के दबाव में हैं।चौधरी के अनुसार, केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक समाधान और उन्नति के लिए स्वयं के भीतर उतरना और आत्म-अनुसंधान करना आवश्यक है। बचपन से हमारा ध्यान बाहरी दुनिया, उपलब्धियों और दूसरों की अपेक्षाओं पर केंद्रित रहता है। ऐसे में आत्म-विचार स्वयं से जुड़ने का मार्ग है।वे कहते हैं कि प्रतिदिन आत्म विचार का अल्प अभ्यास व्यक्ति को अपने मस्तिष्क की परतों को समझने और वैचारिक सीमाओं से आगे बढ़कर गहरी शांति का अनुभव देने में सक्षम है। यह आत्म-बोध उसे अपने अस्तित्व और संसार से जुड़ने में सहायता करता है।चौधरी का मानना है कि स्वयं को जानने की यह यात्रा व्यक्ति को अधिक सजग बनाती है। इससे अपने लक्ष्यों को प्राथमिकता देना, स्पष्ट योजना के साथ आगे बढ़ना और अर्थपूर्ण जीवन जीना आसान हो सकता है। सजग और शांत व्यक्ति प्रकाश पुंज बन औरों को भी अंधेरे से निकालने की क्षमता रखते हैं।
