नई दिल्ली -भारत की समृद्ध लोक संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं को समर्पित आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन 2026 का रविवार को समापन हुआ। इंडिया हैबिटैट सेंटर और अन्वेषा कला केंद्र के संयुक्त आयोजन में छत्तीसगढ़ की पंडवानी और केरल की पुलुवन पाट्टु जैसी दो विशिष्ट लोक परंपराओं को दिल्ली के दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया।दो दिवसीय यह आयोजन आठ और नौ अगस्त को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटैट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में हुआ। सम्मेलन में देश की लोक संगीत, कहानी कहने और अनुष्ठान से जुड़ी परंपराओं की समृद्ध विरासत को प्रस्तुत किया गया। साथ ही पारंपरिक कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को आधुनिक दर्शकों से जुड़ने का मंच भी मिला।तेजन बाई को समर्पित रही पहली शाम सम्मेलन की शुरुआत आठ अगस्त को महान पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई को समर्पित विशेष प्रस्तुति से हुई। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा को गांवों और स्थानीय समुदायों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में उनके योगदान को याद किया गया।प्रसिद्ध पंडवानी कलाकार प्रभा यादव ने पारंपरिक वाद्य कलाकारों के साथ प्रस्तुति दी। कहानी कहने, संगीत, लय और भावपूर्ण अभिनय के अनूठे मेल से सजी इस प्रस्तुति ने तीजन बाई की विरासत को श्रद्धांजलि दी। साथ ही यह भी दिखाया कि मौखिक कहानी कहने की यह लोक परंपरा आज भी जीवंत है।उद्घाटन समारोह में इंडिया हैबिटैट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश, वरिष्ठ पत्रकार और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सलाहकार आर. कृष्ण दास, धरसींवा के विधायक एवं चर्चित छत्तीसगढ़ी फिल्म कलाकार अनुज शर्मा और सांस्कृतिक कार्यकर्ता प्रबल प्रताप सिंह सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। इनकी मौजूदगी ने देश की पारंपरिक कला और कलाकारों के लिए सार्थक मंच उपलब्ध कराने की जरूरत को रेखांकित किया।पुलुवन पाट्टु ने कराया केरल की अनुष्ठानिक परंपरा से परिचय सम्मेलन की दूसरी शाम, नौ अगस्त को, केरल की विशिष्ट लोक परंपरा पुलुवन पाट्टु के नाम रही। दर्शकों को सर्प पूजा से जुड़ी इस प्राचीन अनुष्ठानिक संगीत परंपरा को करीब से अनुभव करने का अवसर मिला।प्रस्तुति का नेतृत्व सत्यनारायणन पी. ने किया। इसमें एक तार वाले पुलुवन वीणा, मिट्टी के घड़े से बने पुलुवन कूडम और कांसे से बने इलथालम झांझ का इस्तेमाल किया गया। उनके साथ बिंदु के.पी. सुरेश बाबू ई. श्रीजीत पी. और श्रीजिल पी. ने प्रस्तुति दी।सर्पों से जुड़ी पौराणिक कथा पर आधारित यह प्राचीन मौखिक परंपरा लय और तालबद्ध वाद्य ध्वनियों पर केंद्रित है। प्रस्तुति में संगीत, अनुष्ठान की सौंदर्य परंपरा और धार्मिक रीति-रिवाजों का समावेश देखने को मिला।पुलुवन पाट्टु के माध्यम से केरल की लोक संस्कृति में कला,आध्यात्मिकता, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाया गया।दो परंपराएं, भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक चित्र दोनों शामों की प्रस्तुतियों ने भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की व्यापक विविधता को सामने रखा। एक ओर छत्तीसगढ़ की पंडवानी में महाकाव्यात्मक कथाओं और मौखिक कहानी कहने की परंपरा दिखाई दी, तो दूसरी ओर केरल की पुलुवन पाट्टु में अनुष्ठान और लोक संगीत की प्राचीन परंपरा देखने को मिली।दोनों की शैली और सांस्कृतिक संदर्भ अलग हैं, लेकिन दोनों परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी समुदायों के ज्ञान, अभ्यास और मौखिक हस्तांतरण के माध्यम से आज भी जीवित हैं।लोक परंपराएं समुदायों की जीवंत सांस्कृतिक स्मृति : प्रो. के.जी. सुरेश इंडिया हैबिटैट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश ने कहा कि भारत की लोक परंपराएं समुदायों की जीवंत सांस्कृतिक स्मृति हैं। ये केवल प्रदर्शन की विधाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें लोगों, प्रकृति, आस्था और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान के संबंध भी समाहित हैं।उन्होंने कहा कि आईएचसी ने अन्वेषा कला केंद्र के साथ मिलकर आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन के माध्यम से पंडवानी और पुलुवन पाट्टु जैसी विशिष्ट लोक परंपराओं को दिल्ली के दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। ऐसे मंच जरूरी हैं, ताकि देश की विविध लोक परंपराओं को लोग देख सकें, समझ सकें, सराह सकें और आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा सके।लोक परंपराएं समुदायों की आवाज अन्वेषा ब्रह्मा अन्वेषा कला केंद्र की सचिव अन्वेषा ब्रह्मा ने कहा कि भारत की लोक परंपराएं समुदायों की आवाज हैं। इनमें सदियों का इतिहास, दर्शन, अनुष्ठान और सामूहिक स्मृतियां समाहित हैं।उन्होंने कहा कि आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन के माध्यम से ऐसे सार्थक मंच तैयार करने का प्रयास है, जहां इन विशिष्ट परंपराओं को उनकी समृद्धि और मौलिक स्वरूप के साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जा सके और नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।लोक विरासत को जीवित रखने में सांस्कृतिक संस्थानों की अहम भूमिका दो दिवसीय सम्मेलन ने भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में सांस्कृतिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी सामने रखा। पारंपरिक कलाकारों को आधुनिक मंच उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन समुदायों और परंपराओं से उनका जुड़ाव बनाए रखना जरूरी है, जहां से ये कलाएं विकसित हुई हैं।ऐसी पहल भारत की विविध लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उसे जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।देशभर की लोक परंपराओं का मंच है आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन इंडिया हैबिटैट सेंटर की ओर से आयोजित आईएचसी लोक संगीत सम्मेलन देश के अलग-अलग हिस्सों की लोक परंपराओं को एक मंच पर लाता है। सम्मेलन के माध्यम से भारत की संगीत, कहानी कहने और अनुष्ठान से जुड़ी विविध परंपराओं का उत्सव मनाया जाता है।अन्वेषा कला केंद्र पिछले 25 वर्षों से भारत की शास्त्रीय और लोक कलाओं के संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण के लिए काम कर रहा है। संस्थान प्रस्तुतियों, उत्सवों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और शैक्षणिक कार्यक्रमों के माध्यम से देशभर के पारंपरिक कलाकारों को मंच उपलब्ध कराता है और भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को नए दर्शकों से जोड़ने का काम करता है।
