नई दिल्ली- अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या और डॉक्टरों पर बढ़ते दबाव के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ा सहायक बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगले पांच से दस वर्षों में एआई स्वास्थ्य क्षेत्र के लगभग हर हिस्से में दिखाई देगा, लेकिन इसका मकसद डॉक्टरों को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर और ज्यादा प्रभावी बनाने का होना चाहिए। डॉक्टर मरीज पर ध्यान दें और एआई पर्दे के पीछे के दोहराव वाले काम संभाले यही भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था का अहम मॉडल हो सकता है।दिल्ली में चल रहे दो दिवसीय डॉक्टर्सएआई वैश्विक सम्मेलन में विशेषज्ञों का मुख्य निष्कर्ष रहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता डॉक्टरों का स्थान लेने के बजाय उनकी क्षमता बढ़ाने वाली बुद्धिमान सहायक बने। जांच और उपचार को तेज करने से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में इसका इस्तेमाल बढ़ेगा, लेकिन मरीज की जिंदगी से जुड़े गंभीर फैसलों में मानवीय निगरानी और डॉक्टर का विवेक सर्वोपरि रहेगा। सम्मेलन की थीम “सटीकता, साझेदारी और संभावनाएं : चिकित्सा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अगला दौर” रखी गई है। सम्मेलन के आयोजन अध्यक्ष डॉ. अमित कुमार डे, वैज्ञानिक अध्यक्ष प्रो. डॉ. एस.वी. कुलकर्णी, आयोजन सचिव डॉ. अश्लेषा तावड़े केलकर और वैज्ञानिक सचिव डॉ. शेली शर्मा हैं। भारतीय चिकित्सा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता महाविद्यालय के संरक्षक डॉ. अशोक कुमार दास वरिष्ठ संकाय सदस्य और मुख्य वक्ता हैं। अंतरराष्ट्रीय संकाय में डॉ. एंथनी सी. चांग शामिल हैं, जबकि मीडिया सहयोग की जिम्मेदारी डॉ. पारस गंगवाल संभाल रहे हैं।डॉक्टरों को मिलेगा मरीज के लिए ज्यादा समय एमजीएम मेडिकल कॉलेज, नवी मुंबई की मेजर डॉ. अश्लेषा तावड़े ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करना जरूरी है। आवाज के जरिए चिकित्सकीय जानकारी दर्ज करने जैसी तकनीकों से डॉक्टरों का दस्तावेजीकरण का समय बचेगा और वे मरीज से बातचीत तथा उसकी समस्या समझने पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे। भारत जैसे बड़े देश में प्रारंभिक जांच के क्षेत्र में भी एआई की बड़ी भूमिका हो सकती है, एक्स-रे, क्षय रोग और अन्य बीमारियों की जांच में यह संदिग्ध मामलों की पहचान में मदद कर सकती है। अस्पतालों में मरीजों की प्राथमिकता तय करने और ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरी मरीजों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में भी इसका इस्तेमाल बढ़ सकता है।तकनीक बढ़े, लेकिन चिकित्सकीय कौशल न घटे विशेषज्ञों ने रोबोट आधारित शल्य चिकित्सा और एआई आधारित दूरबीन जांच उपकरणों की संभावनाओं के साथ चिकित्सकीय कौशल में कमी के खतरे को भी रेखांकित किया। उनका कहना है कि डॉक्टरों को तकनीक पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहिए, कम जोखिम वाले काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता संभाल सकती है, लेकिन गंभीर चिकित्सकीय मामलों में डॉक्टर की भूमिका निर्णायक रहनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार चिकित्सकों को तकनीक का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि इसका इस्तेमाल कहां, कैसे और किस सीमा तक किया जाए। विशेषज्ञों के मुताबिक एआई डॉक्टर की मानवीय भूमिका को खत्म नहीं करेगा, बल्कि उन्हें यह तय करने में मदद करेगा कि कौन से काम मशीन कर सकती है और किन कामों में मानवीय समझ, सहानुभूति और नैतिक निर्णय जरूरी हैं।
