केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, लेकिन संभावित व्यापार नीति बदलाव की खबरों ने भारतीय कृषि बाजारों में गंभीर अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसका सीधा असर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सहित छह प्रमुख राज्यों के तरबूज बीज उत्पादक किसानों पर पड़ रहा है।हालांकि सरकार ने अभी तक तरबूज बीज के आयात को आधिकारिक रूप से नहीं खोला है, लेकिन व्यापारिक सूत्रों और बाजार में चल रही सूचनाओं के अनुसार आयात नीति में जल्द ढील दिए जाने की आशंका है। कृषि जिंस बाजार भविष्य की संभावित मांग और आपूर्ति के आधार पर पहले ही प्रतिक्रिया देना शुरू कर देते हैं। इसी कारण सितंबर की शुरुआत में घरेलू फसल बाजार में आने से पहले ही मंडियों में दबाव और किसानों के बीच चिंता बढ़ गई है।किसानों की मांग. व्यापारिक दबाव में न खोली जाए आयात नीति गुजरात और राजस्थान के तरबूज उत्पादक किसानों ने सरकार से आग्रह किया है कि वह व्यापारियों और सट्टा आधारित बाजार दबाव के प्रभाव में आकर आयात न खोले। मानसून के देर से सक्रिय होने के कारण ग्वार, बाजरा और मूंग जैसी फसलों के साथ तरबूज को अंतरफसल के रूप में उगाने वाले कई किसान इस बार इसे मुख्य फसल के रूप में भी अपना रहे हैं।भारत में तरबूज और उसके बीज का उत्पादन मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात सहित कई राज्यों में किया जाता है। घरेलू किसानों और छोटे उद्योगों की सुरक्षा के उद्देश्य से तरबूज बीज का आयात प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है और आयात की अनुमति केंद्र सरकार एवं विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की नीति के अनुसार नियंत्रित की जाती है। साथ ही, प्रवर्तन एजेंसियां पड़ोसी देशों के रास्ते होने वाली अवैध तस्करी तथा गलत घोषणा के जरिए होने वाले आयात पर भी कार्रवाई करती रही हैं।सितंबर से घरेलू फसल, उसी समय विदेशी माल आने का खतरा भारतीय किसान संघ, राजस्थान के प्रदेश महामंत्री तुलछाराम सिंवर ने BusinessLine को बताया कि ग्वार, बाजरा और मूंग की खेती करने वाले कई किसान, जो सामान्यतः तरबूज को अंतरफसल के रूप में लगाते हैं, इस वर्ष मानसून की परिस्थितियों के कारण इसे मुख्य फसल के रूप में भी अपना रहे हैं।यदि अगस्त के मध्य में आयात की अनुमति या नया कोटा जारी किया जाता है, तो विदेशी माल सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के दौरान भारतीय बाजार में पहुंच सकता है। यही वह समय होगा जब भारतीय किसानों की नई फसल भी मंडियों में आ रही होगी। इससे बाजार में घरेलू और विदेशी आपूर्ति का दोहरा दबाव (Double-Supply Pressure) पैदा हो सकता है, जिसके कारण कीमतों में भारी गिरावट का खतरा है।तरबूज बीज के भाव पहले लगभग ₹70 प्रति किलो तक गिर गए थे, लेकिन मांग बढ़ने और सरकार द्वारा सस्ते आयात को नियंत्रित रखने के कारण कीमतें सुधरकर लगभग ₹200 प्रति किलो तक स्थिर हुई हैं। इसी स्थिरता ने किसानों को इस फसल की ओर दोबारा आकर्षित किया है।उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि विश्वविद्यालय के साथ प्रयास किसान संगठन तरबूज बीज का घरेलू उत्पादन बढ़ाने और उपलब्धता स्थिर करने के लिए कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के साथ भी काम कर रहे हैं।तुलछाराम सिंवर के अनुसार देश में लगभग 60,000–70,000 टन तरबूज बीज की आवश्यकता है और वर्तमान में लगभग 10–15 प्रतिशत की कमी है। लेकिन विश्वविद्यालय और किसानों के प्रयासों से यह कमी हर वर्ष घट रही है।पिछले वर्ष भारत में लगभग 50,000–55,000 टन उत्पादन हुआ। ऐसे में किसानों का कहना है कि यदि घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, तो नीति का उद्देश्य इस अंतर को स्थानीय उत्पादन से पूरा करना होना चाहिए, न कि फसल आने के समय आयात खोलना।सरकार के आश्वासन पर किसानों ने बढ़ाया उत्पादन संसद में केंद्र सरकार द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि जिन प्रतिबंधित कृषि वस्तुओं का भारत में पर्याप्त उत्पादन हो रहा है, उनमें घरेलू किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसी नीतिगत भरोसे के आधार पर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के किसानों ने तरबूज बीज की खेती में निवेश और रकबा बढ़ाया है।तरबूज की बुवाई सामान्यतः जून से अगस्त के बीच होती है और नई फसल सितंबर की शुरुआत से बाजार में आना शुरू हो जाती है।ऐसी स्थिति में घरेलू फसल बाजार में आने से ठीक पहले आयात नीति में बदलाव किसानों के लिए गंभीर आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है।बढ़ती मजदूरी से पहले ही दबाव में किसान राजस्थान के तरबूज किसान लाल खाजी के अनुसार, भारतीय किसानों के लिए सस्ते विदेशी माल से प्रतिस्पर्धा करना कठिन है क्योंकि देश में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।उनके अनुसार खेत में पूरे दिन काम न होने के बावजूद एक मजदूर के लिए लगभग ₹750–₹800 प्रतिदिन तक मजदूरी देनी पड़ती है।तुलछाराम सिंवर का कहना है कि ऐसी बढ़ती उत्पादन लागत के बीच यदि सितंबर में घरेलू फसल आने से ठीक पहले नया आयात कोटा जारी किया गया, तो कीमतों में गिरावट किसानों को गंभीर आर्थिक संकट में डाल सकती है।विदेशी कीमतों में भारी गिरावट से डंपिंग का खतरा भारत द्वारा आयात पर नियंत्रण बनाए रखने के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तरबूज बीज के निर्यात भाव गिरकर लगभग $800 प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गए हैं।इस स्तर पर विदेशी तरबूज बीज भारतीय बंदरगाहों पर लगभग ₹100 प्रति किलो की लागत में पहुंच सकता है और बाजार में लगभग ₹120 प्रति किलो के आसपास बेचा जा सकता है।यदि इतनी कम कीमत वाला विदेशी माल सितंबर-नवंबर के दौरान भारतीय बाजार में आता है, जब घरेलू किसानों की फसल भी मंडियों में पहुंच रही होगी, तो स्थानीय किसानों को अपनी उपज उत्पादन लागत से भी कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।आत्मनिर्भर भारत की नीति से विरोधाभास किसानों का कहना है कि जिस समय भारत में घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और किसान सरकार की “आत्मनिर्भर भारत” तथा फसल विविधीकरण की नीति पर भरोसा करके तरबूज बीज की खेती बढ़ा रहे हैं, उसी समय घरेलू फसल के बाजार में आने से ठीक पहले आयात खोलना इन उद्देश्यों के विपरीत होगा।यदि किसानों को यह संदेश मिलता है कि उत्पादन बढ़ाने के बाद भी फसल आने के समय सस्ता विदेशी माल बाजार में उतारा जा सकता है, तो भविष्य में किसान सरकार की फसल विविधीकरण और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की अपील पर भरोसा करने से हिचक सकते हैं।दीर्घकालिक और स्थिर नीति की मांग किसान संगठनों की मांग है कि सरकार तरबूज बीज के लिए एक स्थिर और दीर्घकालिक नीति तैयार करे, जिसमें घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी जाए और फसल के समय आयात के कारण कीमतों में कृत्रिम गिरावट न आने दी जाए।तुलछाराम सिंवर के अनुसार सरकार को तरबूज बीज का घरेलू उत्पादन बढ़ाने, किसानों को उचित एवं स्थिर मूल्य दिलाने और आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में काम करना चाहिए।किसानों का कहना है कि यह मामला केवल एक फसल की कीमत का नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार की कृषि नीति पर किसानों के भरोसे, फसल विविधीकरण और “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है।

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