मेडनहेड (यूके)- कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमिशन (सीडब्लूजीसी) ने आज एक बड़े अंतरराष्ट्रीय रिसर्च प्रोजेक्ट के बाद, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अपने इतिहास में शहीदों के रिकॉर्ड में सबसे बड़ी बढ़ोतरी की घोषणा की है। यह रिसर्च दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर की गई है। इसके तहत, भारतीय सेना के कुल 9,909 सैनिकों के नाम अब सीडब्लूजीसी के रिकॉर्ड में जोड़े गए हैं, पहले जिनका पता नहीं था। इतिहास की इस पुरानी भूल को अब सुधार लिया गया है, जिसके कारण इन सैनिकों को कभी आधिकारिक तौर पर याद नहीं किया गया था। यह ऐतिहासिक उपलब्धि पंजाब रजिस्टर्स प्रोजेक्ट का नतीजा है, जो सीडब्लूजीसी, यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन (यूकेपीएचए) और ग्रीनविच यूनिवर्सिटी के बीच 5 साल की साझेदारी से पूरा हुआ। इन संस्थाओं ने मिलकर लाहौर म्यूजियम में रखे बेहद दुर्लभ और नाजुक दस्तावेजों का डिजिटलीकरण और बारीकी से विश्लेषण किया। इन दस्तावेजों में पंजाब से भर्ती हुए लगभग 3,20,000 सैनिकों के नाम और उनकी सर्विस से जुड़ी जानकारियां मौजूद थीं। डॉ. इंदर सिंह पालहे (लेसेस्टर, यूके के एक डेंटिस्ट) ने अपने परदादा, केसर सिंह, के बारे में जानकारी ढूंढने में कई साल बिताए। उन्हें बस इतना पता था कि उनके परदादा युद्ध पर गए थे और कभी वापस नहीं लौटे। उन्होंने कहा,सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से लेकर आज अपने परदादा के सर्वोच्च सैन्य बलिदान के असली सच (खासकर उस रेजिमेंट का नाम जिसमें उन्होंने सेवा की थी) को जानने तक का यह सफर बेहद भावुक करने वाला रहा है। उनकी मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी यानी मेरी परदादी और दो छोटे बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हो गए थे। इसलिए, अब उन्हें वैश्विक इतिहास में हमेशा के लिए याद रखा जाएगा, जिससे हमारे पूरे परिवार के बलिदान को पहचान मिली है, और यह हमारे लिए सब कुछ है। मंजिंदर नागरा, रग्बी में इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली सिख महिला को पता चला कि उनके परनाना, जगत सिंह, को कभी वह सम्मान और पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। उन्होंने कहा,जब मैं ब्राइटन में सालाना छत्री मेमोरियल सर्विस में शामिल हुई, जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपनी जान गंवाने वाले अविभाजित भारत के सैनिकों के सम्मान में आयोजित की जाती है, तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुझे इतनी बड़ी खबर मिलेगी। यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन’ से यह जानकर कि मेरे परनाना को अब आधिकारिक तौर पर कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमिशन (सीडब्लूजीसी) के शहीदों के डेटाबेस में शामिल किया जाएगा, दिल को छू लेने वाला और बेहद भावुक करने वाला था। उनकी सेवा और बलिदान को 100 से अधिक साल बाद आखिरकार सही पहचान मिल रही है, हमारे परिवार के लिए बहुत मायने रखता है। आज के इस मुश्किल दौर में, यह पहचान और भी खास लगती है। इतने सालों के बाद, आखिरकार उन्हें वह सम्मान, गरिमा और यादें मिल रही हैं जिसके वे हमेशा से हकदार थे। सीडब्ल्यूजीसी की महानिदेशक क्लेयर हॉर्टन सीबीई ने कहा,प्रथम विश्व युद्ध के एक सदी से भी अधिक समय बाद भी हमारा मिशन जारी है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कॉमनवेल्थ की सेवा में जान गंवाने वाले सभी लोगों को वह सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं। ‘पंजाब रजिस्टर्स’ परियोजना इस मिशन में एक ऐतिहासिक पड़ाव है। इन 9,909 नामों में से हर एक नाम की खोज एक ऐतिहासिक गलती को सुधारने और पारिवारिक इतिहास के गायब अध्यायों को वापस लाने में मदद करती है। यह एक स्थायी, कालातीत स्मरण के रूप में खड़ा है कि स्मरण केवल अतीत से जुड़ा नहीं है यह व्यक्तिगत पहचान, पारिवारिक विरासत और युद्ध की मानवीय कीमत को पहचानने से भी जुड़ा है। सीडब्ल्यूजीसी सार्थक भौतिक स्मरण के प्रति और सरकारों तथा राष्ट्रों के साथ मिलकर काम करने के प्रति प्रतिबद्ध है, ताकि इन व्यक्तिगत सैनिकों को उनके यथोचित सम्मान और गरिमा के साथ श्रद्धांजलि देने के लिए एक स्मारक पर उनके विचार जान सकें।सिख और पंजाबी विरासत को सहेजने के लिए समर्पित यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के अध्यक्ष, ब्रिटिश इतिहासकार और लेखक अमनदीप मादरा ने कहा,ब्रिटेन और पंजाब का एक लंबा इतिहास रहा है, खासकर दोनों विश्व युद्धों के दौरान, और सौ से भी अधिक सालों से इसका एक हिस्सा गायब था। इन जवानों को कभी याद नहीं किया गया, इसलिए नहीं कि उन्होंने सेवा नहीं दी थी, बल्कि इसलिए क्योंकि एक सदी पहले लिए गए एक फैसले ने उनके बलिदान को रिकॉर्ड से बाहर कर दिया था। इस गलती को सुधारने का मतलब है दुनिया भर के परिवारों को उनका इतिहास वापस देना, और जान गंवाने वाले जवानों को सही मायने में और बराबरी से सम्मान देना। यह सब सिर्फ इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि लाहौर म्यूजियम ने इन नाजुक रिकॉर्ड्स को सौ साल तक सुरक्षित रखा, यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रीनविच और कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमिशन ने इस आर्काइव को गंभीरता से लिया, और वॉलंटियर्स ने इस खोए हुए इतिहास को नाम-दर-नाम वापस लाने के लिए अपना कीमती समय दिया। भूले-बिसरे नामों की खोज प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, भारतीय सेना के 14 लाख से अधिक जवानों ने सभी प्रमुख युद्धक्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी थीं। अंग्रेजों के लिए लड़ने वाले हर छह सैनिकों में से एक सैनिक विभाजन-पूर्व भारत से था। इनमें से 5 लाख जवान पंजाब से थे, जिनमें सिख, मुस्लिम, हिंदू और ईसाई सैनिक शामिल थे। इसके बावजूद, मुख्यधारा के इतिहास में लंबे समय तक इनमें से कई की अनदेखी की गई। पंजाब रजिस्टर्स पर शुरुआती काम से पता चला कि युद्ध के दौरान मारे गए कुछ सैनिक सीडब्ल्यूजीसी के रिकॉर्ड और स्मारकों से गायब थे। सीडब्ल्यूजीसी के आधिकारिक इतिहासकार डॉ. जॉर्ज हे के नेतृत्व में किए गए शोध से इसके पीछे की वजह सामने आई। गायब हुए हताहतों में से अधिकांश वे लोग थे जिनकी मृत्यु युद्ध के दौरान भारत के भीतर गैर-युद्ध क्षेत्रों में हुई थी। उस समय की ब्रिटिश भारतीय सरकार के नियमों के कारण, इन जवानों को युद्ध स्मारक (वॉर ग्रेव्स) का दर्जा नहीं दिया गया और इसलिए उनके नाम कभी कमिशन के साथ साझा नहीं किए गए। इस प्रोजेक्ट ने उस पुराने फैसले को पलट दिया है। इस दिशा में एक बड़ी सत्यापन प्रक्रिया पूरी की गई। यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रीनविच के सीडब्ल्यूजीसी द्वारा वित्तपोषित पीएचडी छात्र जॉर्ज विलियम्स और दुनिया भर से आए 19 स्वयंसेवकों ने, जिनमें से कई का इन रजिस्टरों से व्यक्तिगत संबंध था, कुल 15,935 मौतों की जांच की और उनकी तुलना 74,000 मौजूदा सीडब्ल्यूजीसी भारतीय सेना अभिलेख (रिकॉर्ड) से की। उनके इस प्रयास में कंप्यूटर-आधारित विश्लेषण का भी सहारा लिया गया, और प्रत्येक चरण की समीक्षा सीडब्ल्यूजीसी और भारतीय सेना के विशेषज्ञों द्वारा की गई। इस प्रक्रिया से पता चला कि 9,909 लोगों के नाम रिकॉर्ड से गायब थे। पंजाब रजिस्टर्स प्रोजेक्ट, कमिशन के व्यापक नॉन-कॉमेमोरेशन प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसे 2021 में कॉमेमोरेशन में चली आ रही ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के लिए शुरू किया गया था। अब तक, इस कार्यक्रम ने 20,000 से अधिक अतिरिक्त नामों की पहचान की है। डॉ. जॉर्ज हे के अनुसार, पंजाब रजिस्टर्स एक असाधारण अभिलेखीय संसाधन हैं। ये न केवल लाखों सैनिकों के नामों को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि इस बात की महत्वपूर्ण जानकारी भी देते हैं कि स्थानीय स्तर पर भारतीय सेना की भर्ती कैसे की गई, उसका प्रशासन कैसे चला और उन्हें कैसे याद किया गया। इन नामों को बहाल करना सिर्फ रिकॉर्ड बनाए रखने के बारे में नहीं है, बल्कि यह प्रथम विश्व युद्ध के ऐतिहासिक वृत्तांत को पूरा करने और यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि यादगारी उस संघर्ष की पूरी वैश्विक वास्तविकता को दर्शाती हो।यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रीनविच में इतिहास के प्रोफेसर गैविन रैंड ने कहा,इस परियोजना ने न केवल एक ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने में मदद की है, बल्कि इसने ब्रिटेन और दुनिया भर के परिवारों और समुदायों को अपने साझा इतिहास व विरासत से जुड़ने और उसे बेहतर ढंग से समझने का मौका भी दिया है। पंजाब रजिस्टर्स परियोजना यह दर्शाती है कि शोध क्यों महत्वपूर्ण है।
