नई दिल्ली- 60 हजार युवाओं को अप्रेंटिसशिप से जोड़ चुके शिक्षा विशेषज्ञ प्रवेश दुधानी बोले भारत में बेरोजगारी से बड़ी चुनौती युवाओं को नौकरी के लिए तैयार करना है हर साल लाखों युवा कॉलेजों से डिग्री लेकर निकलते हैं। माता-पिता अपनी बचत का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं, उम्मीद होती है कि डिग्री के बाद अच्छी नौकरी मिलेगी। लेकिन हकीकत अक्सर इससे अलग होती है।एक तरफ लाखों युवा नौकरी की तलाश में हैं, दूसरी तरफ कंपनियां कहती हैं कि उन्हें जरूरत के मुताबिक योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे। सवाल यह है कि आखिर कमी कहां रह जाती है मेधावी स्किल्स यूनिवर्सिटी (MSU) के फाउंडर और चांसलर प्रवेश दुधानी मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बेरोजगारी नहीं है, बल्कि युवाओं को नौकरी के लिए तैयार करना है। 60 हजार युवाओं के साथ काम करने के बाद क्या समझ आया? पिछले एक दशक से ज्यादा समय से स्किल डेवलपमेंट सेक्टर में काम कर रहे प्रवेश दुधानी और उनकी टीम देशभर में 150 से ज्यादा स्किल ट्रेनिंग सेंटर स्थापित कर चुकी है। इसके अलावा करीब 60 हजार युवाओं को विभिन्न कंपनियों में अप्रेंटिसशिप के अवसर दिलाने में भी मदद की गई है। दुधानी कहते हैं कि इतने वर्षों के अनुभव के बाद एक बात साफ हुई है देश में डिग्री और नौकरी के बीच बड़ा अंतर है।उनके मुताबिक,आज छात्र ग्रेजुएट तो हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उसके पास वही कौशल हैं जिनकी उद्योगों को जरूरत है? कॉलेज की पढ़ाई और नौकरी की जरूरतों में अंतर दुधानी का मानना है कि लंबे समय तक हमारी शिक्षा व्यवस्था में डिग्री और कौशल को अलग-अलग माना गया। कॉलेजों का फोकस डिग्री देने पर रहा, जबकि नौकरी के लिए जरूरी स्किल्स सीखने के लिए छात्रों को अलग संस्थानों या कोर्सों का सहारा लेना पड़ा। यही वजह है कि बीकॉम का छात्र अकाउंटिंग सीखने के लिए अतिरिक्त कोर्स करता है, इंजीनियरिंग का छात्र कोडिंग सीखने के लिए अलग ट्रेनिंग लेता है और कई युवाओं को नौकरी से पहले दोबारा प्रशिक्षण लेना पड़ता है।वे कहते हैं कि छात्रों को कॉलेज के दौरान ही यह समझ मिलनी चाहिए कि वे किस क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं और उद्योग उनसे क्या उम्मीद करता है।नई शिक्षा नीति ने बदलाव की दिशा दिखाई प्रवेश दुधानी के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने पहली बार शिक्षा और कौशल विकास को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है। इस नीति के तहत स्किलिंग, अप्रेंटिसशिप, उद्योग अनुभव और अकादमिक शिक्षा को एक ही ढांचे में लाने का प्रयास किया गया है। इससे छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव भी मिल सकेगा। दुधानी उदाहरण देते हुए बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति वर्षों से किसी क्षेत्र में काम कर रहा है, तो उसके अनुभव को भी शिक्षा का हिस्सा माना जा सकता है। इससे उसे दोबारा शुरुआत से पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी। AI के दौर में शिक्षक की भूमिका भी बदल रही ChatGPT और Artificial Intelligence के दौर में जानकारी हासिल करना पहले से कहीं आसान हो गया है। ऐसे में दुधानी मानते हैं कि शिक्षकों की भूमिका भी बदलनी होगी। वे कहते हैं,आज जानकारी हर किसी के मोबाइल पर उपलब्ध है। अब जरूरत इस बात की है कि छात्रों को यह सिखाया जाए कि उस जानकारी का उपयोग वास्तविक समस्याओं को हल करने में कैसे किया जाए। उनके अनुसार, शिक्षक अब सिर्फ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि मेंटर और मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे।इंटर्नशिप से मिली सबसे बड़ी सीख अपने छात्र जीवन का अनुभव साझा करते हुए दुधानी बताते हैं कि IIT खड़गपुर में पढ़ाई के दौरान उन्हें भी तब तक यह समझ नहीं आई थी कि पढ़ाई का वास्तविक दुनिया में उपयोग कैसे होगा, जब तक उन्होंने इंटर्नशिप नहीं की।यही अनुभव उनकी सोच में बड़ा बदलाव लेकर आया।उनका मानना है कि यदि छात्रों को शुरुआती वर्षों से ही उद्योगों, अस्पतालों, फैक्ट्रियों और कंपनियों में काम का अनुभव मिले, तो वे नौकरी के लिए ज्यादा तैयार होकर निकलेंगे। इसी सोच से बनी मेधावी स्किल्स यूनिवर्सिटी दुधानी बताते हैं कि स्किल डेवलपमेंट सेक्टर में काम करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि देश को ऐसे शिक्षा मॉडल की जरूरत है, जहां पढ़ाई और काम साथ-साथ चलें। इसी सोच के साथ 2021 में मेधावी स्किल्स यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई। यहां पढ़ाई के साथ उद्योग अनुभव को जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाता है ताकि छात्र सिर्फ डिग्री लेकर नहीं, बल्कि रोजगार के लिए तैयार होकर निकलें। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने छात्रों को डिग्री मिल रही है, बल्कि यह है कि कितने युवा नौकरी के लिए तैयार हो रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में शिक्षा की सफलता केवल डिग्री से नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल से तय होगी।प्रवेश दुधानी कहते हैं, “भारत को डिग्री आधारित सोच से आगे बढ़कर कौशल आधारित सोच अपनानी होगी। पढ़ाई और काम के बीच की दूरी जितनी कम होगी, युवाओं के लिए अवसर उतने ही ज्या
