नोएडा -कीमत, लोकेशन या रिटर्न से पहले ज़मीन खरीदार को जानना चाहिए कि क्या बेचने वाला उसी चीज़ का मालिक है जो बेच रहा है। नवभारत निवास प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक एवं निदेशक प्रिंस धारीवाल के अनुसार, ज़्यादातर निवेशक यह सवाल बहुत देर से पूछते हैं, कई बार पूछते ही नहीं।प्रिंस धारीवाल कहते हैं कि आकर्षक दाम पर प्लॉट बुक करने की जल्दी में खरीदार दलाल की बात मान लेते हैं। ज़ुबानी भरोसा दस्तावेज़ नहीं होता। जो वादा हो,भुगतान से पहले लिखित में दिखना चाहिए,उन्होंने कहा।उनके अनुसार जाँचा हुआ मालिकाना हक़ इस बात का प्रमाण है कि बेचने वाले को ज़मीन बेचने का कानूनी अधिकार है और उस पर किसी और का दावा नहीं। इसमें पंजीकृत दस्तावेज़ों से मालिकाना हक़ की कड़ी, राजस्व रिकॉर्ड और दाखिल-खारिज की प्रविष्टियाँ जाँची जाती हैं,और पक्का किया जाता है कि ज़मीन पर कोई कर्ज़, मुकदमा या विवाद न हो तथा भू-उपयोग और स्वीकृतियाँ सही हों।प्लॉट उतना ही अच्छा है जितना उसका टाइटल। निर्माण, लोन, बिक्री या विरासत, सब तभी संभव है जब टाइटल साफ़ हो,उन्होंने कहा।इसे छोड़ने की कीमत सालों बाद चुकानी पड़ सकती है: किसी दावेदार के विवाद, बैंक के लोन से मना करने या दोबारा बिक्री के अटकने के रूप में। खरीद के समय बचाए कुछ दिन सालों की चिंता बन सकते हैं, प्रिंस धारीवाल ने कहा।वे यह क्रम सुझाते हैं: पहले दस्तावेज़ माँगें, भुगतान की बात बाद में करें पंजीकृत कागज़ात और स्वीकृतियाँ ख़ुद पढ़ें संभव हो तो स्वतंत्र वकील से जाँच करवाएँ; कीमत, लेआउट और विनिर्देश हर शुल्क सहित लिखित में लें; और साइट पर जाएँ।यह मुश्किल नहीं, पर धैर्य माँगता है। सच्चा विक्रेता कागज़ात माँगने का बुरा नहीं मानेगा। जो सवालों से असहज हो, वह खुद एक संकेत है, प्रिंस धारीवाल ने कहा।नवभारत निवास यही तरीका अपनाता है। कंपनी केवल कानूनी रूप से सत्यापित संपत्तियाँ देती है, कीमत, लेआउट और विनिर्देश पहले साझा करती है और कोई छिपा शुल्क नहीं रखती। कानूनी सहायता और निवेश मार्गदर्शन भी मिलता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में यही मानक लागू है।ग्राहको के लिए ज़मीन सिर्फ़ लेन-देन नहीं, परिवार की बचत और भविष्य का ठिकाना है।भरोसा एक बिक्री से नहीं, साफ़ संवाद और ईमानदार मार्गदर्शन से बनता है। जब खरीदार कागज़ात माँगना आदत बना लेंगे, तो पूरा बाज़ार सुरक्षित होगा,” प्रिंस धारीवाल ने कहा।
