अमृतसर –  गतिहीन जीवनशैली, सड़क दुर्घटनाओं तथा बढ़ती आयु के कारण रीढ़ (स्पाइन) संबंधी विकारों और ट्रॉमा (गंभीर चोटों) के मामलों में वृद्धि के बीच, डॉ. अवतार सिंह, एचओडी एवं मुख्य ऑर्थोपेडिक सर्जन, अमनदीप एवं उजाला सिग्नस ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स तथा डॉ. ऐश्वर्या मेहरा, कंसल्टेंट न्यूरो एवं स्पाइन सर्जन, अमनदीप हॉस्पिटल ने आज बेहतर रोगी परिणाम सुनिश्चित करने के लिए प्रारंभिक निदान, साक्ष्य-आधारित उपचार और व्यवस्थित पुनर्वास के महत्व पर प्रकाश डाला।एकीकृत स्पाइन एवं ट्रॉमा देखभाल के विकसित होते दृष्टिकोण पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञों ने जोर दिया कि यद्यपि पीठ दर्द एक सामान्य समस्या है और अधिकांश मामलों में स्वयं ठीक हो जाता है, फिर भी कुछ चेतावनी संकेत ऐसे होते हैं जिन पर तत्काल चिकित्सकीय ध्यान देना आवश्यक है।डॉ. अवतार सिंह के अनुसार,ट्रॉमा विशेषज्ञों ने बताया कि सड़क दुर्घटनाएँ और गिरने की घटनाएँ आज भी फ्रैक्चर तथा स्पाइनल इंजरी के प्रमुख कारण हैं। ट्रॉमा के मामलों में विशेषकर रीढ़ की चोटों में पहले कुछ घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। शीघ्र स्थिरीकरण (स्टेबिलाइजेशन) और समय पर इमेजिंग जांच जटिलताओं तथा दीर्घकालिक विकलांगता को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। डॉ. ऐश्वर्या मेहरा के अनुसार,लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत मुद्रा (पोश्चर) और बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण आज स्पाइन संबंधी विकार अत्यंत सामान्य हो गए हैं। अधिकांश पीठ दर्द आराम और फिजियोथेरेपी से ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में संरचनात्मक समस्याएँ होती हैं जिनके लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक होता है। गंभीर चेतावनी संकेतों की पहचान डॉक्टरों ने सलाह दी कि निम्नलिखित लक्षण दिखाई देने पर मरीजों को तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए, दर्द जो कुछ सप्ताह से अधिक समय तक बना रहे, हाथों या पैरों में कमजोरी या सुन्नपन. मूत्राशय या आंत्र (बॉवेल) नियंत्रण का समाप्त होना,किसी चोट के बाद अत्यधिक दर्द होना,विशेषज्ञों ने बताया कि प्रारंभिक निदान नसों पर दबाव (नर्व कंप्रेशन) या अस्थिरता (इंस्टेबिलिटी) की प्रगति को रोक सकता है और दीर्घकालिक गतिशीलता तथा जीवन की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।आधुनिक उपचार पद्धतियाँ: व्यक्तिगत एवं साक्ष्य-आधारित उपचार की पद्धति प्रत्येक मरीज की स्थिति के अनुसार निर्धारित की जाती है। अनेक मरीज दवाइयों, जीवनशैली में बदलाव और फिजियोथेरेपी सहित रूढ़िवादी (कंज़र्वेटिव) उपचार से लाभ प्राप्त करते हैं। शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की सलाह केवल तब दी जाती है जब इसकी चिकित्सकीय आवश्यकता हो विशेष रूप से नसों पर दबाव, अस्थिरता या गंभीर फ्रैक्चर के मामलों में।ट्रॉमा केयर में स्थिरीकरण चाहे वह बिना सर्जरी के हो या सर्जरी के माध्यम से फ्रैक्चर की गंभीरता और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। सर्जिकल तकनीकों में हुई प्रगति ने अधिक सटीक फिक्सेशन और उपयुक्त मामलों में शीघ्र गतिशीलता को संभव बनाया है।मिनिमली इनवेसिव तकनीकें: मरीजों के लिए इसका क्या अर्थ है विशेषज्ञों ने स्पाइन एवं ट्रॉमा केयर में मिनिमली इनवेसिव प्रक्रियाओं के बढ़ते उपयोग पर भी चर्चा की। इन तकनीकों में छोटे चीरे और विशेष उपकरणों का उपयोग कर प्रभावित हिस्से तक पहुँचा जाता है, जिससे आसपास की मांसपेशियों और ऊतकों को कम नुकसान होता है।पारंपरिक ओपन सर्जरी की तुलना में मिनिमली इनवेसिव तकनीकों से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं  मांसपेशियों को कम क्षति, रक्तस्राव में कमी, चयनित मामलों में अस्पताल में कम समय तक भर्ती रहना, प्रारंभिक अवस्था में अपेक्षाकृत तेज़ गतिशीलता,हालाँकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि सभी मरीज इन प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त नहीं होते और उपचार का चयन हमेशा चिकित्सकीय उपयुक्तता के आधार पर किया जाता है।पुनर्वास रिकवरी का एक महत्वपूर्ण आधार
दोनों सर्जनों ने इस बात पर जोर दिया कि सर्जरी या फिक्सेशन उपचार का केवल एक हिस्सा है।डॉ. अवतार सिंह ने बताया,प्रारंभिक और मार्गदर्शित गतिशीलता जटिलताओं को कम करती है तथा मरीजों को दैनिक गतिविधियों में शीघ्र लौटने में सहायता करती है।डॉ. ऐश्वर्या मेहरा ने कहा,पुनर्वास अत्यंत आवश्यक है। व्यवस्थित फिजियोथेरेपी मांसपेशियों को मजबूत बनाती है, लचीलापन बहाल करती है और दीर्घकालिक रिकवरी में सहायता करती है। कार्यात्मक रिकवरी और जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान विशेषज्ञों ने कहा कि सफल उपचार का उद्देश्य केवल दर्द से राहत प्रदान करना नहीं है। अंतिम लक्ष्य मरीज की स्वतंत्रता, कार्यक्षमता और समग्र जीवन गुणवत्ता को बहाल करना है, ताकि वह सुरक्षित एवं साक्ष्य आधारित देखभाल के माध्यम से अपने कार्यस्थल, खेलकूद और सामान्य दैनिक जीवन में वापस लौट सके।रोकथाम और जागरूकता,डॉक्टरों ने जोखिम को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाने की सलाह दी ,स्पाइन स्वास्थ्य के लिए सही मुद्रा बनाए रखें, नियमित व्यायाम करें,लंबे समय तक लगातार बैठने से बचें, लगातार बने रहने वाले लक्षणों के लिए शीघ्र चिकित्सकीय परामर्श लें ट्रॉमा की रोकथाम के लिए  सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करें सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करें, विशेष रूप से महिलाओं के लिए 40 वर्ष की आयु के बाद ऑस्टियोपोरोसिस की जांच पर विचार करें विशेषज्ञों ने निष्कर्ष में कहा, “रोकथाम, जागरूकता और समय पर चिकित्सकीय परामर्श ही ऐसे सबसे प्रभावी साधन हैं, जिनकी मदद से स्पाइन एवं ट्रॉमा संबंधी समस्याओं से होने वाली दीर्घकालिक विकलांगता को कम किया जा सकता है।

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